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Sunday, 16 April 2017

दिल्ली में बैठे शेरों को सत्ता का लकवा मार गया,


(कश्मीर में जेहादियों द्वारा
सैनिकों को थप्पड़-लात मार कर अपमानित करने पर
एक सैनिक की सरकार से अपील 
को बंया करती  नयी कविता)
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रचनाकार - कवि गौरव चौहान (उ. प्र.)
9557062060
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दिल्ली में बैठे शेरों को सत्ता का लकवा मार गया,
इस राजनीति के चक्कर में सैनिक का साहस हार गया,

मैं हूँ जवान उस भारत का,जो "जय जवान" का पोषक है,
जो स्वाभिमान का वाहक है जो दृढ़ता का उद्घोषक है,

मैं हूँ जवान उस भारत का, जो शक्ति शौर्य की भाषा है,
जो संप्रभुता का रक्षक है,जो संबल की परिभाषा है,

उस भारत की ही धरती पर ये फिर कैसी लाचारी है,
हम सैनिक कैसे दीन हुए,अब कहाँ गयी खुद्दारी है?

"कश्मीर हमारा" कहते हो,पर याचक जैसे दिखते हो,
तुम राष्ट्रवाद के थैले में,गठबंधन करके बिकते हो,

वर्दी सौंपी,हथियार दिए,पर अधिकारों से रीते हैं,
हम सैनिक घुट घुट रहते है,कायर का जीवन जीते हैं,

छप्पन इंची वालों ने कुछ ऐसे हमको सम्मान दिए,
कागज़ की कश्ती सौंपी है,अंगारो के तूफ़ान दिए,

हर हर मोदी घर घर मोदी,यह नारा सिर के पार गया,
इक दो कौड़ी का जेहादी,सैनिक को थप्पड़ मार गया,

अब वक्ष ठोंकना बंद करो,घाटी में खड़े सवालों पर,
ये थप्पड़ नही तमाचा है भारत माता के गालों पर,

सच तो ये है दिल्ली वालों,साहस संयम से हार गया,
इक पत्थरबाज तुम्हारे सब,कपड़ों को आज उतार गया,

इस नौबत को लाने वालों,थोड़ा सा शर्म किये होते,
तुम काश्मीर में सैनिक बन,केवल इक दिवस जिए होते,

इस राजनीती ने घाटी को,सरदर्द बनाकर छोड़ा है,
भारत के वीर जवानों को नामर्द बना कर छोड़ा है,

अब और नही लाचार करो,हम जीते जी मर जायेंगे,
दर्पण में देख न पाएंगे,निज वर्दी पर शर्मायेंगे,

या तो कश्मीर उन्हें दे दो,या आर पार का काम करो,
सेना को दो ज़िम्मेदारी,तुम दिल्ली में आराम करो,

थप्पड़ खाएं गद्दारों के,हम इतने भी मजबूर नही,
हम भारत माँ के सैनिक हैं,कोई बंधुआ मजदूर नहीं,

मत छुट्टी दो,मत भत्ता दो,बस काम यही अब करने दो,
वेतन आधा कर दो,लेकिन कुत्तों में गोली भरने दो,

भारत का आँचल स्वच्छ रहे ,हम दागी भी हो सकते है,
दिल्ली गर यूँ ही मौन रही,हम बागी भी हो सकते हैं,

कान्हा के विरह में जन जीवन एवं पृक्रति दौनों दुंखी हैं


प्रिय मित्रो 
ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो चुका है , कान्हा के विरह में जन जीवन एवं पृक्रति दौनों दुंखी हैं । कविता के माध्यम से विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ । एक तो भीषण गरमी दूसरी विरहाग्नि । तपन दूसरी में ज़्यादा है ।

धाये जबसे श्याम द्वारिका ,
नयन नीर नहिं रुकें राधिका ।
मन विषाद तिनके गहराया ,
गया चॉद छिप सूनी राका ।

गोकुल वन उपवन में आया ,
अँधियारा मावस का छाया ।
कान्हां के विरहा की अग्नि ,
लागे मन न छूटे काया ।

फोड़ें मिल मटकी दधि ग्वालिन ,
थके नयन तकें प्रेम पुजारिन ।
साँवरी सूरत बसी मन तिनके ,
पनघट पे न जांय पनिहारिन ।

चरवाहा जग का नटनागर ,
मोर मुकुट सिर पट पीताम्बर ।
को लै लकुटि धेनु चरावै ,
बूढत दुखीं विरहा भव सागर ।

खड़े लखें तरु कदंब के तन्हां ,
बहे नीर कलकल तट यमुना ।
शीतल मंद सुगंध मरुत बह ,
तिन की पीर न जाईं बरना ।

बिलग डाल बैठे सुक मैना ,
बोलें बचन न खाऐं चबैना ।
जाऐं कहाँ तज गोकुल वनिका ,
काटें कटें न बासर रैना ।

कान्हां की ना बाजे मुरलिया ,
कुहू कुहू ना कूके कोयलिया ।
सूनौ जग अमवा की डारी ,
अब हमार को नाव खिवैया ।

बंसीवट यमुना तट पावन ,
अब वो रहा ना लोकलुभावन ।
यादों की कान्हा में जीयें ,
गोकुल की नादां वे ग्वालिन ।

किससे कहैं मन की वे पीरा ,
जपत निरंतर कर मति धीरा ।
पट्टो जी को मंत्र यह भावा ,
हो आर्त " जय कृष्ण " पुकारा ।

विनोद पट्टो जी