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Sunday, 16 April 2017

कान्हा के विरह में जन जीवन एवं पृक्रति दौनों दुंखी हैं


प्रिय मित्रो 
ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो चुका है , कान्हा के विरह में जन जीवन एवं पृक्रति दौनों दुंखी हैं । कविता के माध्यम से विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ । एक तो भीषण गरमी दूसरी विरहाग्नि । तपन दूसरी में ज़्यादा है ।

धाये जबसे श्याम द्वारिका ,
नयन नीर नहिं रुकें राधिका ।
मन विषाद तिनके गहराया ,
गया चॉद छिप सूनी राका ।

गोकुल वन उपवन में आया ,
अँधियारा मावस का छाया ।
कान्हां के विरहा की अग्नि ,
लागे मन न छूटे काया ।

फोड़ें मिल मटकी दधि ग्वालिन ,
थके नयन तकें प्रेम पुजारिन ।
साँवरी सूरत बसी मन तिनके ,
पनघट पे न जांय पनिहारिन ।

चरवाहा जग का नटनागर ,
मोर मुकुट सिर पट पीताम्बर ।
को लै लकुटि धेनु चरावै ,
बूढत दुखीं विरहा भव सागर ।

खड़े लखें तरु कदंब के तन्हां ,
बहे नीर कलकल तट यमुना ।
शीतल मंद सुगंध मरुत बह ,
तिन की पीर न जाईं बरना ।

बिलग डाल बैठे सुक मैना ,
बोलें बचन न खाऐं चबैना ।
जाऐं कहाँ तज गोकुल वनिका ,
काटें कटें न बासर रैना ।

कान्हां की ना बाजे मुरलिया ,
कुहू कुहू ना कूके कोयलिया ।
सूनौ जग अमवा की डारी ,
अब हमार को नाव खिवैया ।

बंसीवट यमुना तट पावन ,
अब वो रहा ना लोकलुभावन ।
यादों की कान्हा में जीयें ,
गोकुल की नादां वे ग्वालिन ।

किससे कहैं मन की वे पीरा ,
जपत निरंतर कर मति धीरा ।
पट्टो जी को मंत्र यह भावा ,
हो आर्त " जय कृष्ण " पुकारा ।

विनोद पट्टो जी

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