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Wednesday, 2 November 2016

दरिद्रता कौन है, और कहाँ रहती है

दरिद्रता कौन है,
और कहाँ रहती है
कहा जाता है कि, दरिद्रा माँलक्ष्मी की बड़ी बहन का नाम है। इनकी उत्पति समुद्र मन्थन के समय लक्ष्मी जी की उत्पत्ति से पहले हुई थी। इसलिये दरिद्रा को ज्येष्ठा भी कहते हैँ।
दरिद्र का विवाह दु:सह ब्राम्हण से हुआ। विवाह के बाद दु:सह मुनि जब अपनी पत्नी के साथ विचरण करते तो जिस जगह भगवान का उदघोष, हवन, वेदपाठ होता, वहाँ-वहाँ से दरिद्रा दोनो कान बंद कर दूर भाग जाती। यह देखकर दु:सह मुनि बहुत दु:खी हो गये। उन दिनो सब जगह धर्मकी चर्चा और पुण्य कृत्य हुआ ही करते थे। अत: दरिद्रा भागते भागते थक गयीँ।
तब दु:सह मुनि उसे लेकर निर्जन वन मेँ चले गये। तब दरिद्रा डर गयी थी कि मेरे पति मुझे छोडकर किसी अन्य कन्या से विवाह न कर लेँ। इस कारण वह बहुत परेशान रहने लगी।
अचानक एक दिन उन दोनो को महर्षि मार्कण्डेय जी के दर्शन हुए, तब उन्होने महर्षि को साष्टांग प्रणाम किया और अपनी ब्यथा सुनाई।
अतः दयालु मार्कण्डेय मुनि ने उन्हे बताया कि,
जहाँ रुद्रके भक्त हो और भस्म लगाने वाले लोग हो वहाँ तुम लोग प्रवेश न करना।
जहाँ नारायण गोविन्द शंकर महादेव आदि भगवान के नाम का कीर्तन होता हो वहाँ तूम दोनो को नही जाना चाहिये, क्योकि आग उगलता हुआ श्री विष्णु का चक्र उन लोँगो के अशुभ का नाश करता रहता है।
जिस घर मेँ वेदपुराण, गीता का उदघोष होता हो। जहाँ के लोग नित्य भगवान की पूजा मेँ लगे हुए हो उस घर को दूर से ही त्याग देना।
तब दु:सह मुनि ने पूछा- महर्षे! हमारे रहने के स्थान कौन कौन से हैँ ? इसपर महर्षि मार्कण्डेय जीने कहा-
जहाँ पति पत्नी परस्पर झगडा करते हो उस घर मेँ तुम दोनो निर्भय होकर घुस जाओ।
जहाँ भगवान की निन्दा होती हो, पूजा, जप, होम आदि न होते हो वह स्थान तुम दोनो के लिए सर्वथा अनुकूल है ।
जो लोग बच्चो को न देकर स्वयं खा लेते हो ।
जिस घर मेँ काँटेवाले, दूधवाले, फलवाले, पलाश, निम्बु, केला, इमली, ताड़, कदम्ब, खैर आदी के पेड़ हो वहाँ तुम दरिद्रता के साथ आराम से रह सकते हो ।
जो स्नान आदि मंगल कृत्य न करते हो, दाँत मुँह साफ नही करते हो, गंदे कपडे पहनते हो, संध्याकाल मेँ सोते या खाते हो, दूसरे की स्त्री से सम्बन्ध बनाते हो, हाथ-पैर न धोते हो, उन घरो से तुम्हे कोई नही निकाल सकता है।

by Sadhvi Purvi Sakshi

क्रोध

क्रोध


1. क्रोध को जीतने में मौन सबसे अधिक सहायक है।
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2- मूर्ख मनुष्य क्रोध को जोर-शोर से प्रकट करता है, किंतु बुद्धिमान शांति से उसे वश में करता है।
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3- क्रोध करने का मतलब है, दूसरों की गलतियों की सजा स्वयं को देना।
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4- जब क्रोध आए तो उसके परिणाम पर विचार करो।
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5- क्रोध से धनी व्यक्ति घृणा और निर्धन तिरस्कार का पात्र होता है।
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6- क्रोध मूर्खता से प्रारम्भ और पश्चाताप पर खत्म होता है।
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7- क्रोध के सिंहासनासीन होने पर बुद्धि वहां से खिसक जाती है।
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8- जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में नहीं कह सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है।
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9- क्रोध मस्तिष्क के दीपक को बुझा देता है। अतः हमें सदैव शांत व स्थिरचित्त रहना चाहिए।
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10- क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रांत हो जाती है, स्मृति भ्रांत हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि नष्ट होने पर प्राणी स्वयं नष्ट हो जाता है।
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11- क्रोध यमराज है।
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12- क्रोध एक प्रकार का क्षणिक पागलपन है।
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13-क्रोध में की गयी बातें अक्सर अंत में उलटी निकलती हैं।
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14- जो मनुष्य क्रोधी पर क्रोध नहीं करता और क्षमा करता है वह अपनी और क्रोध करने वाले की महासंकट से रक्षा करता है।
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15- सुबह से शाम तक काम करके आदमी उतना नहीं थकता जितना क्रोध या चिन्ता से पल भर में थक जाता है।
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16- क्रोध में हो तो बोलने से पहले दस तक गिनो, अगर ज़्यादा क्रोध में तो सौ तक।
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17- क्रोध क्या हैं ? क्रोध भयावह हैं, क्रोध भयंकर हैं, क्रोध बहरा हैं, क्रोध गूंगा हैं, क्रोध विकलांग है।
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18- क्रोध की फुफकार अहं पर चोट लगने से उठती है।
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19- क्रोध करना पागलपन हैं, जिससे सत्संकल्पो का विनाश होता है।
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20- क्रोध में विवेक नष्ट हो जाता है।