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Saturday, 2 April 2016

ज्ञानी जी का ज्ञान......... पद

सभा सदों ने एक दिन कहा- आपने उन सभी को पद दिया जिन्होंने आपका प्रिय किया था, पर हनुमान जी को कोई पद नहीं मिला. उनके साथ न्याय न हो सका.

श्रीराम तो जानते थे कि हनुमान जी को प्रभु भक्ति के अतिरिक्त कोई इच्छा ही नहीं लेकिन सभा सदों के मन से यह बात निकालनी जरूरी थी कि न्याय में चूक नहीं हुई है.

प्रभु ने हनुमान जी से कहा- आप हमेशा मेरे संकटमोचक रहे हैं. मेरे सभी प्रिय जनों को कोई न कोई पद मिला, पर आप रह गए. आपको जो पद प्रिय हो वह कहिए, मैं आपको वह देना चाहता हूं.

हनुमान जी ने कहा- आपकी असीम अनुकंपा मुझे मिलती रहती है, मुझे इसके अलावा और किसी चीज की आवश्यकता ही नहीं.परंतु भगवान बार-बार हनुमान जी से कोई पद मांगने को कहते रहे. 
हनुमान जी ने कहा- प्रभु आपने सबको एक-एक पद दिया है. मेरा काम एक पद से नहीं चलेगा. क्या आप मुझे दो पद दे सकते हैं ?

प्रभु ने कहा- हनुमान जी आप मांगिए तो सही सर्वस्व आपका है.
हनुमान जी ने कहा- प्रभु पद पाने से मन में मोह और मद आ जाता है. ऐसे पद का क्या लाभ जिससे अहंकार घेर ले.

हनुमान जी ने भगवान के दोनों चरण पकड़ लिए और कहा- प्रभु मुझे तो इन दो पदों की सदैव सेवा का अधिकार चाहिए.