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Sunday, 20 March 2016

आज देश में चिकित्सा व्यवसाय की अजीब स्थिति है

आज देश में चिकित्सा व्यवसाय की अजीब स्थिति है 
डॉक्टर्स के बच्चे ही आज चिकित्सक बनने से भाग रहे हैं,

नेता और ब्यूरोक्रेट्स फिर भी सेवाओं में सुधार की, बांग लगा रहे हैं 
लम्बी शिक्षा , कठिन परीक्षा , मांगो अधिकार , तो सबको आता है गुस्सा।

आज देश की स्वास्थय सेवाएं बदहाल हैं 
क्योकि आज देश के डॉक्टर ही बीमार हैं। 

पैसा हर कोई कमाना चाहता है
पर डॉक्टर मांगे फीस, 
तो यह नहीं भाता है।

चिकित्सा अब बन गई, व्यापारिक वस्तु है
पर समाज के प्रति फिर भी चिकित्सक की , 
सामाजिक जिम्मेदारी है 
आपात काल में हुए खर्चे की न कोई , सरकारी जिम्मेदारी है 
पर जो हो जाए गल्ती तो , 
कीमत भारी है।

विधायक जनसेवा करते , अपना भत्ता बढ़ा रहे हैं 
डॉक्टर मांगे कितनी फीस , उसपे गुर्रा रहे हैं
सांसद परामेडिकल्स को भी, डॉक्टर्स बना रहे हैं
कॉर्पोरेट्स के चक्कर में, डॉक्टर्स को गुलाम बना रहे हैं।

क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट , पी एन डी टी एक्ट
अफस्पा से भी खतरनाक हैं 
छोटी सी प्रशाशनिक गलती पर 
भारी जुर्माने और जेल का प्रावधान है।

देश के नेता, जिम्मेदारी से भाग रहे हैं 
बिना समझे स्थिति को, बेरहम कानून बना रहे हैं 
अपनी जिम्मेदारियों का ठीकरा , चिकत्सकों पर फोड़ रहे हैं 
देश में चिकित्सकों का, मनोबल तोड़ रहे हैं।

डॉक्टर बनते हैं समाज सेवा और आजीविका के लिए , 
न की ता जिंदगी बात- बात पर, अदालत जाने के लिए ,
आजीविका कमाने के और भी लाख साधन और समाधान हैं 
क्योंकि नहीं चिकित्सा के लिए देश में , न्याय संगत विधान है।

स्थिति कितनी भी विकट है, या मुश्किल विधान है 
मुझे फिर भी ख़ुशी और चिकित्सक होने का अभिमान है ,
कमाता हूँ मैं इज़्ज़त से , समाज में सम्मान है ,

चाहे कोई कुछ भी समझे ,यह सबसे बेहतरीन काम है।
पैसा कमाना जरूरी है , हर इंसान की मजबूरी है 

पर जब किसी दुखी मरीज , की तकलीफ दूर हो जाती है 
उससे बड़ी डॉक्टर के लिए , दुनिया की कोई ख़ुशी नहीं होती 
किसी की कृतज्ञ मुस्कराहट से बड़ी, कोई पारितोषिक नहीं होती।

ज्ञानी जी का ज्ञान.....................गंदे बहेलिये की झोंपड़ी

राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और तक्षक ( सर्प ) के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु का भय दूर नहीं हुआ। अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।

बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी वर्षा पड़ने लगी। जंगल में सिंह व्याघ्र आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।
रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बहेलिये की झोंपड़ी देखी । वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त वह झोंपड़ी थी।

उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन पीछे उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं। मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ।। इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता। मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह सुबह होते ही इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, सिर्फ एक रात्रि ही काटनी है।बहेलिये ने राजा को ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दोहरा दिया।

राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा। सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह उठा तो वही सब परमप्रिय लगने लगा। अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा।

वह बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना करने लगा। इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा। राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित से पूछा," परीक्षित ! बताओ, उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था ? "

परीक्षित ने उत्तर दिया," भगवन् ! वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइये ? वह तो बड़ा भारी मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता है। उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है। "
श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा," हे राजा परीक्षित ! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं। इस मल-मूल की गठरी देह ( शरीर ) में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप झंझट फैला रहे हैं और मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है ?
राजा परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।

वास्तव में यही सत्य है। जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है तो अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना करता है कि हे भगवन् ! मुझे यहाँ ( इस कोख ) से मुक्त कीजिए, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा। और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो ( उस राजा की तरह हैरान होकर ) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया ( और पैदा होते ही रोने लगता है ) फिर उस गंध से भरी झोंपड़ी की तरह उसे यहाँ की खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है। यह मेरी भी कथा है और आपकी भी।