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Monday, 7 March 2016

Jokes ......... ICC World T20 2016 आश्चर्यजनक निर्णय सुरक्षा कारणों से स्थान में बदलाव किये गए

ICC World T20 2016 आश्चर्यजनक निर्णय सुरक्षा कारणों से स्थान में बदलाव किये गए












Mar 15: IND vs NZ उत्तरीपुरा
Mar 16: WI vs ENG  मुबारकगंज
Mar 16: PAK vs Q2  बाराबंकी 
Mar 17: SL vs Q1   अयोध्या
Mar 18: AUS vs NZ  फैज़ाबाद
Mar 18: SA vs ENG  भेटरिया
Mar 19: IND vs PAK दुबियाना
Mar 20: SA vs Q1  सुल्तानपुर
Mar 20: SL vs WI   बस्ती
Mar 21: AUS vs Q2 मिल्कीपुर
Mar 22: NZ vs PAk पुरबाजर
Mar 23: ENG Vs Q1 मसोधा 
Mar 23: IND Vs Q2 कुमारगंज
Mar 25: PAK Vs AUS गोरखपुर
Mar 25: SA vs WI   सीतापुर
Mar 26: Q2 vs NZ   लखीमपुर
Mar 26: ENG vs SL बहराइच
Mar 27: IND vs AUS  महराजगंज
Mar 27: Q1 vs WI  आजमगढ़
Mar 28: SA vs SL बरेली
Mar 30: Semifinal 1 बैरी
Mar 31: Semifinal 2 काकुपुर

Apr 3   : FINAL  शिवराजपुर  के नहरिया मैदान में खेला जायेगा

  All the best India......

ज्ञानी जी का ज्ञान...............एक नास्तिक की भक्ति

एक नास्तिक की भक्ति 

हरिराम नामक आदमी शहर के एक छोटी सी गली में रहता था। वह एक मेडिकल दुकान का मालिक था।
सारी दवाइयों की उसे अच्छी जानकारी थी,
दस साल का अनुभव होने के कारण उसे अच्छी तरह पता था कि कौन सी दवाई कहाँ रखी है।
वह इस पेशे को बड़े ही शौक से बहुत ही निष्ठा से करता था।
दिन-ब-दिन उसके दुकान में सदैव भीड़ लगी रहती थी,
वह ग्राहकों को वांछित दवाइयों को सावधानी और इत्मीनान होकर देता था।

पर उसे भगवान पर कोई भरोसा नहीं था वह एक नास्तिक था,
भगवान के नाम से ही वह चिढ़ने लगता था।
घरवाले उसे बहुत समझाते पर वह उनकी एक न सुनता था,
खाली वक्त मिलने पर वह अपने दोस्तों के संग मिलकर घर या दुकान में ताश खेलता था।

एक दिन उसके दोस्त उसका हालचाल पूछने दुकान में आए और अचानक बहुत जोर से बारिश होने लगी,बारिश की वजह से दुकान में भी कोई नहीं था।

बस फिर क्या, सब दोस्त मिलकर ताश खेलने लगे।
तभी एक छोटा लड़का उसके दूकान में दवाई लेने पर्चा लेकर आया। उसका पूरा शरीर भीगा था।

हरिराम ताश खेलने में इतना मशगूल था कि बारिश में आए हुए उस लड़के पर उसकी नजर नहीं पड़ी।
ठंड़ से ठिठुरते हुए उस लड़के ने दवाई का पर्चा बढ़ाते हुए कहा- “साहब जी मुझे ये दवाइयाँ चाहिए, मेरी माँ बहुत बीमार है, उनको बचा लीजिए. बाहर और सब दुकानें बारिश की वजह से बंद है। आपके दुकान को देखकर मुझे विश्वास हो गया कि मेरी माँ बच जाएगी। यह दवाई उनके लिए बहुत जरूरी है।

इस बीच लाइट भी चली गई और सब दोस्त जाने लगे।
बारिश भी थोड़ा थम चुकी थी,

उस लड़के की पुकार सुनकर ताश खेलते-खेलते ही हरिराम ने दवाई के उस पर्चे को हाथ में लिया और दवाई लेने को उठा,
ताश के खेल को पूरा न कर पाने के कारण अनमने से अपने अनुभव से अंधेरे में ही दवाई की उस शीशी को झट से निकाल कर उसने लड़के को दे दिया।

उस लड़के ने दवाई का दाम पूछा और उचित दाम देकर बाकी के पैसे भी अपनी जेब में रख लिया।
लड़का खुशी-खुशी दवाई की शीशी लेकर चला गया। वह आज दूकान को जल्दी बंद करने की सोच रहा था।

थोड़ी देर बाद लाइट आ गई और वह यह देखकर दंग रह गया कि उसने दवाई की शीशी समझकर उस
लड़के को दिया था, वह चूहे मारने वाली जहरीली दवा है,
जिसे उसके किसी ग्राहक ने थोड़ी ही देर पहले लौटाया था,
और ताश खेलने की धुन में उसने अन्य दवाइयों के बीच यह सोच कर रख दिया था कि ताश की बाजी के बाद फिर उसे अपनी जगह वापस रख देगा।
अब उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

उसकी दस साल की नेकी पर मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस लड़के बारे में वह सोच कर तड़पने लगा। सोचा यदि यह दवाई उसने अपनी बीमार माँ को देगा, तो वह अवश्य मर जाएगी।

लड़का भी बहुत छोटा होने के कारण उस दवाई को तो पढ़ना भी नहीं जानता होगा। एक पल वह अपनी इस भूल को कोसने लगा और ताश खेलने की अपनी आदत को छोड़ने का निश्चय कर लिया
पर यह बात तो बाद के बाद देखा जाएगी।
अब क्या किया जाए ?

उस लड़के का पता ठिकाना भी तो वह नहीं जानता।
कैसे उस बीमार माँ को बचाया जाए?
सच कितना विश्वास था उस लड़के की आंखों में।
हरिराम को कुछ सूझ नहीं रहा था।

घर जाने की उसकी इच्छा अब ठंडी पड़ गई। दुविधा और बेचैनी उसे घेरे हुए था। घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा।
पहली बार उसकी दृष्टि दीवार के उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके पिता ने जिद्द करके भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर दुकान के उदघाटन के वक्त लगाई थी,
पिता से हुई बहस में एक दिन उन्होंने हरिराम से भगवान को कम से कम एक शक्ति के रूप मानने और पूजने की मिन्नत की थी।

उन्होंने कहा था कि भगवान की भक्ति में बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह व्याप्त है और हमें सदैव अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देता है।
हरिराम को यह सारी बात याद आने लगी। आज उसने इस अद्भुत शक्ति को आज़माना चाहा।

उसने कई बार अपने पिता को भगवान की तस्वीर के सामने कर जोड़कर, आंखें बंद करते हुए पूजते देखा था।
उसने भी आज पहली बार कमरे के कोने में रखी उस धूल भरे कृष्ण की तस्वीर को देखा और आंखें बंद कर दोनों हाथों को जोड़कर वहीं खड़ा हो गया।
थोड़ी देर बाद वह छोटा लड़का फिर दुकान में आया।
हरिराम को पसीने छूटने लगे।
वह बहुत अधीर हो उठा।

पसीना पोंछते हुए उसने कहा- क्या बात है बेटा तुम्हें क्या चाहिए?
लड़के की आंखों से पानी छलकने लगा। उसने रुकते-रुकते कहा- बाबूजी...बाबूजी माँ को बचाने के लिए मैं दवाई की शीशी लिए भागे जा रहा था, घर के करीब पहुँच भी गया था, बारिश की वजह से ऑंगन में पानी भरा था और मैं फिसल गया। दवाई की शीशी गिर कर टूट गई।

क्या आप मुझे वही दवाई की दूसरी शीशी दे सकते हैं बाबूजी?
लड़के ने उदास होकर पूछा।
हाँ! हाँ ! क्यों नहीं?

हरिराम ने राहत की साँस लेते हुए कहा। लो, यह दवाई!
पर उस लड़के ने दवाई की शीशी लेते हुए कहा,
पर मेरे पास तो पैसे नहीं है,
उस लड़के ने हिचकिचाते हुए बड़े भोलेपन से कहा।
हरिराम को उस बिचारे पर दया आई।

कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले जाओ और अपनी माँ को बचाओ।
जाओ जल्दी करो, और हाँ अब की बार ज़रा संभल के जाना।
लड़का, अच्छा बाबूजी कहता हुआ खुशी से चल पड़ा।
अब हरिराम की जान में जान आई।

भगवान को धन्यवाद देता हुआ अपने हाथों से उस धूल भरे तस्वीर को लेकर अपनी धोती से पोंछने लगा और अपने सीने से लगा लिया।
अपने भीतर हुए इस परिवर्तन को वह पहले अपने घरवालों को सुनाना चाहता था।

जल्दी से दुकान बंद करके वह घर को रवाना हुआ।
उसकी नास्तिकता की घोर अंधेरी रात भी अब बीत गई थी और अगले दिन की नई सुबह एक नए हरिराम की प्रतीक्षा कर रही

ज्ञानी जी का ज्ञान...............आदमी की भैंस को चट्टान से गिराकर मार डालेंगे

ज्ञानी जी का ज्ञान...............आदमी की भैंस को चट्टान से गिराकर मार डालेंगे


एक  संत अपने एक शिष्य के साथ कहीं से गुजर रहा था। चलते-चलते वे एक खेत के पास पहुंचे। खेत अच्छी जगह स्थित था लेकिन उसकी हालत देखकर लगता था मानो उसका मालिक उस पर जरा भी ध्यान नहीं देता है।
खैर, दोनों को प्यास लगी थी सो वे खेत के बीचो-बीच बने एक टूटे-फूटे घर के सामने पहुंचे और दरवाज़ा खटखटाया।

अन्दर से एक आदमी निकला, उसके साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे भी थे। सभी फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे।

संत बोले, “ श्रीमान, क्या हमें पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है!”
“ज़रूर!”, आदमी उन्हें पानी का जग थमा रहा था तो संत ने पूछा।
“मैं देख रहा हूँ कि आपका खेत इतना बड़ा है पर इसमें कोई फसल नही बोई गयी है, और ना ही यहाँ फलों के वृक्ष दिखायी दे रहे हैं…तो आखिर आप लोगों का गुजारा कैसे चलता है?”

“जी, हमारे पास एक भैंस है, वो काफी दूध देती है उसे पास के गाँव में बेच कर कुछ पैसे मिल जाते हैं और बचे हुए दूध का सेवन कर के हमारा गुजारा चल जाता है।”, आदमी ने समझाया।

संत और शिष्य आगे बढ़ने को हुए तभी आदमी बोला, “ शाम काफी हो गयी है, आप लोग चाहें तो आज रात यहीं रुक जाएं!”
दोनों रुकने को तैयार हो गए।

आधी रात के करीब जब सभी गहरी नींद में सो रहे थे तभी संत ने शिष्य को उठाया और बोला, “चलो हमें अभी यहाँ से चलना है, और चलने से पहले हम उस आदमी की भैंस को चट्टान से गिराकर मार डालेंगे।”
शिष्य को अपने गुरु की बात पर यकीन नहीं हो रहा था पर वो उनकी बात काट भी नहीं सकता था।

दोनों भैंस को मार कर रातों-रात गायब हो गए!
यह घटना शिष्य के जेहन में बैठ गयी और करीब 10 साल बाद जब वो एक सफल उद्यमी बन गया तो उसने सोचा क्यों न अपनी गलती का पश्चाताप करने के लिए एक बार फिर उसी आदमी से मिला जाए और उसकी आर्थिक मदद की जाए।

अपनी चमचमाती कार से वह उस खेत के सामने पहुंचा।
शिष्य को अपनी आँखों पे यकीन नहीं हो रहा था। वह उजाड़ खेत अब फलों के बागीचे में बदल चुका था… टूटे-फूटे घर की जगह एक शानदार बंगला खड़ा था और जहाँ अकेली भैंस बंधी रहती थी वहां अच्छी नस्ल की कई गाएं और भैंस अपना चारा चर रही थीं।

शिष्य ने सोचा कि शायद भैंस के मरने के बाद वो परिवार सब बेच-बाच कर कहीं चला गया होगा और वापस लौटने के लिए वो अपनी कार स्टार्ट करने लगा कि तभी उसे वो दस साल पहले वाला आदमी दिखा।
“ शायद आप मुझे पहचान नहीं पाए, सालों पहले मैं आपसे मिला था।”, शिष्य उस आदमी की तरफ बढ़ते हुए बोला।

“नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, मुझे अच्छी तरह याद है, आप और आपके गुरु यहाँ आये थे…कैसे भूल सकता हूँ उस दिन को; उस दिन ने तो मेरा जीवन ही बदल कर रख दिया। आप लोग तो बिना बताये चले गए पर उसी दिन ना जाने कैसे हमारी भैंस भी चट्टान से गिरकर मर गयी। कुछ दिन तो समझ ही नहीं आया कि क्या करें, पर जीने के लिए कुछ तो करना था, सो लकड़ियाँ काट कर बेचने लगा, उससे कुछ पैसे हुए तो खेत में बोवाई कर दी… 
सौभाग्य से फसल अच्छी निकल गयी, बेचने पर जो पैसे मिले उससे फलों के बागीचे लगवा दिए और यह काम अच्छा चल पड़ा और इस समय मैं आस-पास के हज़ार गाँव में सबसे बड़ा फल व्यापारी हूँ…सचमुच, ये सब कुछ ना होता अगर उस भैंस की मौत ना हुई होती !

“लेकिन यही काम आप पहले भी कर सकते थे?”, शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।
आदमी बोला, “ बिलकुल कर सकता था! पर तब ज़िन्दगी बिना उतनी मेहनत के आराम से चल रही थी, कभी लगा ही नहीं कि मेरे अन्दर इतना कुछ करने की क्षमता है सो कोशिश ही नहीं की पर जब भैंस मर गयी तब हाथ-पाँव मारने पड़े और मुझ जैसा गरीब-बेहाल इंसान भी इस मुकाम तक पहुँच पाया।”
आज शिष्य अपने गुरु के उस निर्देश का असली मतलब समझ चुका था और बिना किसी पश्चाताप के वापस लौट पा रहा था।

हम भी संसारी परिस्थितियों के इतने आदि हो जाते हैं कि बस उसी में जीना सीख लेते हैं,उसी संसार के लिए सब करते हैं,फिर उसी संसार से जो भी मिलता है उसी मे दीनहीन बनकर गुजारा करता है  फिर चाहे वो परिस्थितियां बुरी ही क्यों न हों!

पर ऐसा करने में हम कभी भी अपने full potential को realize नहीं कर पाते हैं और बहुत सी ऐसी चीजें करने से चूक जाते हैं जिन्हें करने की हमारे अन्दर क्षमता है और जो हमारी life को कहीं बेहतर बना सकती हैं।

सोचिये, कहीं आपकी ज़िन्दगी में कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको लग रहा है कि आपने उस भैंस को बाँध कर रखा है जबकि असलियत में उस भैंस ने आपको बाँध रखा है! और अगर आपको लगे कि ऐसा है, तो आगे बढिए…हिम्मत करिए, अपनी संसार रूपी भैंस को ज्ञान से मारिये ; आजाद होइए…

आगे बढ़कर अपने जीवन को सफल बना कर उन्नति के पथ पर अग्रसर करे।

जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन। जैसा पीओ पानी .... वैसी होवे वाणी।।

Beautiful story on Honesty.....

बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा। सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है , तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए। एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा कोआमंत्रित कर भोजनप्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की। साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी। दोपहर का समय था। सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए।थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा। "साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली। 

सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी।साधु बाबा आराम करने लगे। खीर थोड़ी हजम हुई। साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ? ?? साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली। 

शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े।सेठ दूसरे दिन रूपये गिननेबैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली। सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे ? नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी। इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।" सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब 


यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते हैं।" साधुः "यह दयालुता नहीं है। मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था। 

साधु ने कहा सेठ ....तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?" सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ,उसी चावल की खीर थी। साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि'हे राम.... यह क्या हो गया ?मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी। इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया। . ."इसीलिए कहते हैं किः..... जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन। जैसा पीओ पानी .... वैसी होवे वाणी।।