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Wednesday, 2 March 2016

गिलहरी और दस बोरी अखरोट ...................

इस कहानी पर ध्यान दें 
एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय 
से आती थी और अपना काम पूर्ण मेहनत 
तथा ईमानदारी से करती थी !
गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के 
भी खूब खुश थी क्यों कि उसके मालिक .......
जंगल के राजा शेर नें उसे दस बोरी अखरोट 
देने का वादा कर रक्खा था !


गिलहरी काम करते करते थक जाती थी 
तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ ....
वैसे ही उसे याद आता था :- कि शेर उसे 
दस बोरी अखरोट देगा - गिलहरी फिर 
काम पर लग जाती !


गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते - 
कुदते  देखती थी तो उसकी भी ईच्छा होती 
थी कि मैं भी enjoy करूँ !

पर उसे अखरोट याद आ जाता था !
और वो फिर काम पर लग जाती !

शेर कभी - कभी उसे दूसरे शेर के पास 
भी काम करने के लिये भेज देता था !

ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना 
चाहता था , शेर बहुत ईमानदार था !

ऐसे ही समय बीतता रहा....

एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के 
राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट 
दे कर आजाद कर दिया !

गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने 
लगी कि:-अब अखरोट हमारे किस काम के ?
पुरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस 
गये, इसे खाऊँगी कैसे !

यह कहानी आज जीवन की हकीकत 
बन चुकी है !


इन्सान अपनी ईच्छाओं का त्याग करता है, 
और पूरी जिन्दगी नौकरी में ,business में, धन कमाने में बिता देता है !
60 वर्ष की ऊम्र जब वो रिटायर्ड होता है 
तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है !या bank balance होता है 
उसे use करने की क्षमता खो चुका होता है 
तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है,
परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है।


क्या नये मुखिया को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड के लिये : -
कितनी इच्छायें मरी होगी ?
कितनी तकलीफें मिली होगी ?
कितनें सपनें रहे होंगे ?

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क्या फायदा ऐसे फन्ड का जिसे 
पाने के लिये पूरी जिन्दगी लगाई जाय 
और उसका इस्तेमाल खुद न कर सके !

"इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी 
तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय 
को खरीद सके।

इसलिए हर पल को खुश होकर जियो 
वयस्त रहो 
पर साथ में मस्त रहो 
सदा स्वस्थ रहो
Busy रहो 
पर    Be + Easy रहो

Difference between NEEDS & WANTS

There is a big difference between NEEDS & WANTS
जो इस अन्तर को जानता है वह समझ सकता है मुझ मुझे कहां रुकना है, उसे फिर कोई खतरा नहीं है।~

आप भोजन करने बैठे हैं; आपको कुछ भी पक्का पता नहीं चलता, कहां रुकना है। शरीर की कितनी जरूरत है, उससे आप भोजन नहीं करते; स्वाद की कितनी मांग है, उससे भोजन चलता है। स्वाद का कोई अंत नहीं है, स्वाद की कोई सीमा नहीं है। और स्वाद पेट से पूछता ही नहीं कि कहां रुकना है। स्वाद पागल है, उस पर कोई नियंत्रण नहीं है।

आवश्यकताएं (NEEDS)जरूरी हैं, पर (WANTS) वासनाएं जरूरी नहीं हैं।

आवश्यकता और वासना में इतना ही फर्क है। आवश्यकता उस सीमा का नाम है जितना जीवन के लिए–श्वास चले, शरीर चले, और खोज चलती रहे आत्मा की–उतने के लिए जो काफी है। उससे ज्यादा विक्षिप्तता है जो वासना मे है, उससे ज्यादा का कोई अर्थ नहीं है। फिर उस दौड़ का कोई अंत भी नहीं हो सकता। आवश्यकता की तो सीमा आ सकती है, लेकिन वासना की कोई सीमा नहीं आ सकती।वासना मे सीमा का कोई कारण ही नहीं, क्योंकि वह मन का खेल है। कहां रुकें? मन कहीं भी नहीं रुकता।क्योकि मन का पेट कभी भरता नही

संत कहते हैं ,"जो जानता है कहां रुकना है, उसे कोई खतरा नहीं है।'
खतरा उसी जगह शुरू होता है जहां हमें पता नहीं चलता, कहां रुकें।

धनपतियों को देखें। धन उस जगह पहुंच गया है जहां उन्हें अब उसकी कोई भी जरूरत नहीं है, लेकिन रुक नहीं सकते।

शायद अब उनके पास जो धन है उससे वे कुछ खरीद भी नहीं सकते। क्योंकि जो भी खरीदा जा सकता था वे खरीद चुके।

अब धन का उनके लिए कोई भी मूल्य नहीं है। धन का मूल्य कम होता जाता है, जैसे-जैसे धन बढ़ता है। आपके पास एक लाख रुपए हैं तो मूल्य ज्यादा है, एक करोड़ होंगे तो मूल्य कम हो जाएगा। क्योंकि अब आप कम चीजें खरीद सकते हैं; चीजें नहीं बचतीं जिनको आप खरीदें। फिर दस करोड़ हो जाते हैं तो धन बिलकुल फिजूल होने लगता है। फिर दस अरब हो जाते हैं। तो दस अरब के ऊपर जो धन आप इकट्ठा कर रहे हैं, वह बिलकुल कागज है। उसका कोई भी मूल्य नहीं है। क्योंकि उस धन का मूल्य ही है कि उससे कुछ खरीदा जा सके। अब आपके पास खरीदने को भी कुछ नहीं है।

मगर दौड़ जारी रहती है। वह मन दौड़ता चला जाता है। वह किसी आवश्यकता को, किसी सीमा को नहीं मानता। मन विक्षिप्त है।
खतरा तो वहीं आता है जब हमें रुकने के संकेत सुनाई नहीं पड़ते, और हम बढ़ते ही चले जाते हैं। जरूरत पूरी हो जाती है और हम बढ़ते चले जाते हैं। खतरे का मतलब यह है कि अब हम खो गए पागलपन में, अब इससे लौटना बहुत मुश्किल हो जाएगा। और अगर आप लौटना चाहेंगे तो आपको खोजना पड़ेगा वह स्थान जहां आपकी आवश्यकता समाप्त हो गई थी, फिर भी आप दौड़ते चले गए। अपनी आवश्यकता पर लौट आना संन्यास है। अपनी आवश्यकता को भूल कर बढ़ते चले जाना संसार है।