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Tuesday, 9 February 2016

गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जाती कहां हैं.?

गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जातीकहां हैं.?


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पतित पावनी गंगा को देव नदी कहा
जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार गंगा
स्वर्ग से धरती पर आई है। मान्यता है कि
गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली
है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी
है।
श्री हरि और भगवान शिव से घनिष्ठ संबंध
होने पर गंगा को पतित पाविनी कहा
जाता है। मान्यता है कि गंगा में स्नान
करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो
जाता है।
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एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने
बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली,"
प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के
पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों
का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप
समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"
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इस पर श्री हरि बोले,"गंगा! जब साधु,
संत, वैष्णव आ कर आप में स्नान करेंगे तो आप
के सभी पाप घुल जाएंगे।"
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गंगा नदी इतनी पवित्र है की प्रत्येक
हिंदू की अंतिम
इच्छा होती है उसकी अस्थियों का
विसर्जन गंगा में ही
किया जाए लेकिन यह अस्थियां जाती
कहां हैं?
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इसका उत्तर तो वैज्ञानिक भी नहीं दे
पाए क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों
का विसर्जन करने के बाद भी गंगा जल
पवित्र एवं पावन है। गंगा सागर तक खोज
करने के बाद भी इस प्रश्न का पार नहीं
पाया जा सका।
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सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मृत्यु
के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत
व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन
करना उत्तम माना गया है। यह अस्थियां
सीधे श्री हरि के चरणों में बैकुण्ठ जाती
हैं।
जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप
आता है उसे
मरणोपरांत मुक्ति मिलती है। इन बातों
से गंगा के प्रति हिन्दूओं की आस्था तो
स्वभाविक है।
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वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा जल में पारा
अर्थात (मर्करी)
विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में
कैल्शियम और
फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो
जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है।
वैज्ञानिक दृष्टि से हड्डियों में गंधक
(सल्फर) विद्यमान होता है जो पारे के
साथ मिलकर पारद का निर्माण होता
है। इसके साथ-साथ यह दोनों मिलकर
मरकरी सल्फाइड साल्ट का निर्माण करते
हैं। हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम, पानी
को स्वच्छ रखने का काम करता है।
धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक
है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी
जीव अंततःशिव और शक्ति में ही विलीन
हो जाते हैं।.......
हर हर गंगे

जगन्नाथ जी का यह मंदिर बारिश की सटीक भविस्यवाणी करता है। आइये जानें कैसे ?

जगन्नाथ जी का यह मंदिर बारिश की सटीक भविस्यवाणी करता है।  आइये जानें कैसे ?





भारत के बारे में अभी हमें बहुत कुछ जानना बाकी है। 
भारत देश एक ऐसा देश है जो आश्चर्यो से भरा हुआ है। इस देश के हर राज्य के हर शहर के कोने-कोने में कोई न कोई अदुभुत जगह मौजूद है। ऐसी ही एक जगह है उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर जो की अपनी एक अनोखी विशेषता के कारण प्रसिद्ध है। 

इस मंदिर की विशेषता यह है की यह मंदिर बारिश होने की सुचना 7 दिन पहले ही दे देता है। आप शायद यकीन न करे पर यह हकीकत है।
यह मंदिर भगवान जगन्नाथ का मंदिर है। यह मंदिर कानपुर जनपद के भीतरगांव विकासखंड मुख्यालय से तीन किलोमीटर पर बेंहटा गांव में स्थित है। 

ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर की खासियत यह है कि बरसात से 7 दिन पहले इसकी छत से बारिश की कुछ बूंदे अपने आप ही टपकने लगती हैं।
हालांकि इस रहस्य को जानने के लिए कई बार प्रयास हो चुके हैं पर तमाम सर्वेक्षणों के बाद भी मंदिर के निर्माण तथा रहस्य का सही समय पुरातत्व वैज्ञानिक पता नहीं लगा सके। 

बस इतना ही पता लग पाया कि मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 11वीं सदी में हुआ था। उसके पहले कब और कितने जीर्णोद्धार हुए या इसका निर्माण किसने कराया जैसी जानकारियां आज भी अबूझ पहेली बनी हुई हैं, लेकिन बारिश की जानकारी पहले से लग जाने से किसानों को जरूर सहायता मिलती है।

इस मन्दिर में भगवान जगन्नाथ, बलदाऊ और बहन सुभद्रा की काले चिकने पत्थर की मूर्तियां स्थापित हैं। वहीं सूर्य और पदमनाभम भगवान की भी मूर्तियां हैं। मंदिर की दीवारें 14 फीट मोटी हैं। वर्तमान में मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है। मंदिर से वैसी ही रथ यात्रा निकलती है जैसी पुरी उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर से निकलती है।

मौसमी बारिश के समय मानसून आने के एक सप्ताह पूर्व ही मंदिर के गर्भ ग्रह के छत में लगे मानसूनी पत्थर से उसी घनत्वाकार की बूंदें टपकने लगती हैं, जिस तरह की बरसात होने वाली होती है। जैसे ही बारिश शुरू होती है वैसे ही पत्थर सूख जाता है।

मंदिर के पुजारी दिनेश शुक्ल ने बताया कि कई बार पुरातत्व विभाग और आईआईटी के वैज्ञानिक आए और जांच की। न तो मंदिर के वास्तविक निर्माण का समय जान पाए और न ही बारिश से पहले पानी टपकने की पहेली सुलझा पाए हैं। हालांकि मंदिर का आकार बौद्ध मठ जैसा है। जिसके कारण कुछ लोगों की मान्यता है कि इसको सम्राट अशोक ने बनवाया होगा, परन्तु मंदिर के बाहर बने मोर और चक्र की आकृति से कुछ लोग इसको सम्राट हर्षबर्धन से जोड़ कर देखते हैं।