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Saturday, 30 April 2016

Jokes ..... इवेन-ऑड प्रसंग पर तमाम कवि

दिल्ली का इवेन-ऑड प्लान पिछले कई दिनों से चर्चा का विषय बना हुआ है। टीवी पर तर्क-वितर्क चल रहा है लेकिन अगर इवेन-ऑड प्रसंग पर तमाम कवि कविता लिखते तो क्या निकल कर आता? शायद कुछ ऐसा;

कुमार विश्वास

कोई सक्सेस समझता है, कोई फेल्योर कहता है,
मगर टीवी की बहसों में हमारा शोर चलता है,
कहा भक्तों ने क्या इसबात में क्या आनी-जानी है,
इधर अरविन्द दीवाना, उधर दिल्ली दिवानी है।

रहीम

रहिमन इवेन-ऑड की महिमा करो बखान,
जबरन ओहि सक्सेस कहो, चलती रहे दुकान।

कबीर

कबिरा इवेन-ऑड की ऐसी चली बयार,
सब आपस में लडि मरें भली करें करतार।

बच्चन

कार्यालय जाने की खातिर,
घर से चलता मतवाला,
असमंजस है कौन सवारी
चढ़ जाए भोला-भाला,
कोई कहता मेट्रो धर लो,
कोई कहता बस धर लो,
मैं कहता हूँ ऑफिस त्यागो,
पहुँचो सीधे मधुशाला।

गुलज़ार

धुएं की चादर की सिलवटों में
लिपटी दिल्ली,
सुरमई धूप सेंक रही है आज,
आज दिखी नहीं,
मोटरों की परछाइयां,
जिनसे गुफ्तगू करती थी
ये सडकें,
जो देखा करती थीं
इन सड़कों की स्याह पलकों को,
किसी ने कह दिया उनको
कि इवेन-ऑड जारी है।

मैथिलीशरण गुप्त

इवेन-ऑड कहानी
विषमय वायु हुई नगरी की,
खग-मृग पर छाई मुरधानी,
इवेन-ऑड कहानी
जन हैं हठी चढ़े सब वाहन,
दिल्ली नगरी रही न पावन,
अश्रु बहाते लोचन मेरे
जन करते नादानी
इवेन-ऑड कहानी,
हुआ विवाद सदय-निर्दय का,
अधियारा छाया है भय का,
उषा-किरण से निकलें विषधर,
व्यथित हुआ यह पानी
इवेन-ऑड कहानी।

काका हाथरसी

गैरज में कारें खड़ी, जाना है अस्पताल,
धुंआ घुसता नाक में आँख हो रही लाल,
आँख हो रही लाल, पास ना इवेन गाडी,
सरकारी माया से कक्का हुए कबाड़ी,
कह काका कविराय कोई तो मुझे बचाए,
अपनी इवेन कार चला हमको पहुंचाए।

दिनकर

हो मुद्रा गर तो आधा दो,
उसमें भी हो गर बाधा तो,
फिर दे दो हमको ऑड कार,
मेरे गैरेज में इवेन चार,
था वचन कि बसें चलाओगे
अपना कर्तव्य निभाओगे,
पर भीड़ देख होता प्रतीत,
इससे अच्छा था वह अतीत,
जब मनुज पाँव पर चलता था,
आचरण उसे न खलता था,
अब भूमि नहीं जो रखे पाँव,
आहत करता शासकी दांव,
जाने कैसे दिन आयेंगे,
इस मनुज हेतु क्या लायेंगे,
यह इवेन-ऑड कब टूटेगा,
यह महावज्र कब फूटेगा,
हो सावधान रायतामैन,
कर कुछ सबको आये जो चैन,
अन्यथा नागरिक लिए रोष,
मढ़ देगा तेरे शीश दोष।

Wednesday, 27 April 2016

ज्ञानी जी का ज्ञान......सर्वभाव से प्रभु चरणों में समर्पित

कामी क्रोधी लालची,इनसे ना भगती होय।
         भगती करै कोई सुरमा,जात वर्ण कुल खोय
एक राजा बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य मालिक को बडी श्रद्धा, आराधना से याद करता था।
एक दिन भगवान ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा---"राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी  कोई इच्छा है?"


प्रजा को चाहने वाला राजा बोला मेरे पास आपका दिया सब कुछ है। आपकी कृपा से राज्य में सब प्रकार सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक ईच्छा है कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन दीजिये।"
"यह तो सम्भव नहीं है।"भगवान ने राजा को समझाया। परन्तु राजा जिद्द करने लगा। आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले--"ठीक है, कल सबको उस पहाडी के पास लाना। मैं पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।"


राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और प्रभु को धन्यवाद दिया।
अगले दिन सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड के नीचे मेरे साथ पहुँचे, वहाँ मालिक आप सबको दर्शन देंगे।
दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।


चलते-चलते रास्ते में एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ उस ओर भागने लगे। तभी राजा ने सबको सतर्क किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे क्योंकि तुम सब प्रभु से मिलने जा रहे हो,इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो।परन्तु लोभ-लालच में वशीभूत कुछ तांबे कि सिक्कों वाली पहाडी की ओर भाग गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे कि पहले ये सिक्कों को समेट ले,मालिक से तो फिर कभी मिल लेंगे।
राजा खिन्न मन से आगे बढ़े।कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया। इस बार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे। उनके मन में विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के  फिर मिले न मिले,प्रभु तो फिर कभी मिल जायेगें।


इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो बचे हुये लोग तथा स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों की तरह सिक्कों की गठरी लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे---"देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। जिनके सामने सारी दुनिया कि दौलत क्या चीज है?" सही बात है--रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया।


कुछ दुर चलने पर देखा कि सप्तरंगी आभा बिखरता हीरों का पहाड है। अब तो रानी से रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण से वह भी दौड़ पडी और हीरों की गठरी बनाने लगी। फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बाँधने लगी। वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई।बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढ़ते गये।वहाँ सचमुच प्रभु खड़े उसका इन्तजार कर रहे थे। राजा को देखते ही मुस्कुराये और पूछा --"कहाँ है सब। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हुँ।"राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया। 

तब प्रभु ने राजा को समझाया--
"राजन जो लोग भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते है, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा आर्शीवाद से भी वंचित रह जाते हैं।"
सार.
जो जीव अपनी मन और बुद्धि से मालिक पर कुर्बान हो जाते हैं, सर्वभाव से प्रभु चरणों में समर्पित हो जाते है......वह मालिक  के प्रिय बनते हैं, उन्हीं पर प्रभु की विशेष रजा व दया होती है।


सर्वभाव से समर्पित आत्मा को सतलोक जाने में कोई बाधा नहीं होती।
यहाँ 'सर्वभाव' से आशय यह है...
"जो सतगुरु को सर्वप्रथम माने..
"जो गुरुजी के एक-एक वचन को माने और उस पर चलें..
"जो सतगुरु की पूर्ण मर्यादा में रहकर आधीन भाव से सत्भक्ति करता रहें..
सतगुरु हमें यहाँ से हंस बनाकर सतलोक ले जायेंगे।
सतगुरु कहते है कि...'मेरा तो कोई एक है, ये काल का सब संसार'!!

Sunday, 17 April 2016

ज्ञानी जी का ज्ञान.......तिब्बत में एक पुरानी कथा है

तिब्बत में एक पुरानी कथा है कि दो भाई हैं। पिता मर गया है, तो उनके पास सौ घोड़े थे। घोड़े का काम था। सवारियों को लाने-ले जाने का काम था। तो पिता मरते वक्त बड़े भाई को कह गया कि तू बुद्धिमान है, छोटा तो अभी छोटा है। तू अपनी मर्जी से जैसा भी बंटवारा करना चाहे, कर देना। तो बड़े भाई ने बंटवारा कर दिया। निन्यानबे घोड़े उसने रख लिए, एक घोड़ा छोटे भाई को दे दिया। आस-पास के लोग चौंके भी। पड़ोसियों ने कहा भी कि यह तुम क्या कर रहे हो? तो बड़े भाई ने कहा कि मामला ऐसा है, यह अभी छोटा है, समझ कम है। निन्यानबे कैसे सम्भालेगा? तो मैं निन्यानबे ले लेता हूं, एक उसे दे देता हूं।
ठीक छोटा भी थोड़े दिन में बड़ा हो गया, लेकिन वह एक से काफी प्रसन्न था, एक से काम चल जाता था। वह खुद ही नौकर नहीं रखने पड़ते थे, अलग इंतजाम नहीं करना पड़ता था—वह खुद ही शहर की तरह चला जाता था। यात्रा करवा आता था लोगों के लिए। उसका भोजन का काम चल जाता था। लेकिन बड़ा भाई बड़ा परेशान था। निन्यानबे घोड़े थे, निन्यानबे चक्कर थे। नौकर रखने पड़ते। अस्तबल बनाना पड़ता। कभी कोई घोड़ा बीमार हो जाता, कभी कुछ हो जाता। कभी कोई घोड़ा भाग जाता, कभी कोई नौकर न लौटता। रात हो जाती, देर हो जाती, वह जागता, वह बहुत परेशान था।
एक दिन आकर उसने अपने छोटे भाई को कहा कि तुझसे मेरी एक प्रार्थना है कि तेरा जो एक घोड़ा है वह भी तू मुझे दे दे। उसने कहा—क्यों? तो उस बड़े भाई ने कहा—तेरे पास एक ही घोड़ा है, नहीं भी रहा तो कुछ ज्यादा नहीं खो जाएगा। मेरे पास निन्यानबे हैं, अगर एक मुझे और मिल जाए तो सौ हो जाएंगे। पर मेरे लिए बड़ा सवाल है। क्योंकि मेरे पास निन्यानबे हैं। एक मिलते ही पूरी सेंचुरी, पूरे सौ हो जाएंगे। तो मेरी प्रतिष्ठा और इज्जत का सवाल है। अपने बाप के पास सौ घोड़े थे, कम-से-कम बाप की इज्जत का भी इसमें सवाल जुड़ा हुआ है। छोटे भाई ने कहा, आप यह घोड़ा भी ले जाएं। क्योंकि मेरा अनुभव यह है कि निन्यानबे में आपको मैं बड़ी तकलीफ में देखता हूं, तो मैं सोचता हूं, एक में भी निन्यानबे बंटे नहीं, लेकिन थोड़ी बहुत तकलीफ तो होगी ही। यह भी आप ले जाएं।
तो वह छोटा उस दिन से इतने आनन्द में हो गया क्योंकि अब वह खुद ही घोड़े का काम करने लगा। अब तक कभी घोड़ा बीमार पड़ता था, कभी दवा लानी पड़ती थी; कभी घोड़ा राजी नहीं होता था जाने को; कभी थककर बैठ जाता था। हजार पंचायतें होती थीं। वह भी बात खत्म हो गयी। अब तक घोड़े की नौकरी करनी पड़ती थी। उसकी लगाम पकड़कर चलानी पड़ती थी, वह बात भी खत्म हो गयी। अपना मालिक हो गया। अब वह खुद ही बोझ ले लेता, लोगों को कंधे पर बिठा लेता और यात्रा कराता। लेकिन बड़ा बहुत परेशान हो गया। वह बीमार ही रहने लगा। क्योंकि सौ में से अब कहीं एकाध कम न हो जाए, कोई घोड़ा मर न जाए, कोई घोड़ा खो न जाए, नहीं तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी।
मारपा यह कहानी अकसर कहा करता था—एक तिब्बती फकीर था—वह अकसर यह कहानी कहा करता था। और वह कहता था—मैंने दो ही तरह के आदमी देखे—एक, वे जो वस्तुओं पर इतना भरोसा कर लेते हैं कि उनकी वजह से ही परेशान हो जाते हैं। और एक वे, जो अपने पर इतने भरोसे से भरे होते हैं कि वस्तुएं उन्हें परेशान नहीं कर पातीं। दो ही तरह के लोग हैं इस पृथ्वी पर। दूसरी तरह के लोग बहुत कम हैं इसलिए पृथ्वी पर आनंद बहुत कम है। पहले तरह के लोग बहुत हैं, इसलिए पृथ्वी पर दुख बहुत है।

Friday, 15 April 2016

ज्ञानी जी का ज्ञान........मैं अंधा पैदा हुआ, सौ पुत्र मारे गए भगवन मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है

महाभारत के युद्ध समाप्त होने पर धृतराष्ट्र ने श्रीकृष्ण से पूछा- मैं अंधा पैदा हुआ, सौ पुत्र मारे गए भगवन मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है जिसकी सजा मिल रही है.
श्रीकृष्ण ने बताना शुरू किया- पिछले जन्म में आप एक राजा थे. आपके राज्य में एक तपस्वी ब्राह्मण थे. उनके पास हंसों का एक जोड़ा था जिसके चार बच्चे थे.
ब्राह्मण को तीर्थयात्रा पर जाना था लेकिन हंसों की चिंता में वह जा नहीं पा रहे थे. उसने अपनी चिंता एक साधु को बताई. साधु ने कहा- तीर्थ में हंसों को बाधक बताकर हंसों का अगला जन्म खराब क्यों करते हो.

राजा प्रजापालक होता है. तुम और तुम्हारे हंस दोनों उसकी प्रजा हो. हंसों को राजा के संरक्षण में रखकर तीर्थ को जाओ.
ब्राह्मण हंस और उसके बच्चे आपके पास रखकर तीर्थ को गए. आपको एक दिन मांस खाने की इच्छा हुई. आपने सोचा सभी जीवों का मांस खाया है पर हंस का मांस नहीं खाया. आपने हंस के दो बच्चे भूनकर खा लिए.

आपको हंस के मांस का स्वाद लग गया. हंस के एक-एक कर सौ बच्चे हुए और आप सबको खाते गए। अंततः हंस का जोड़ा मर गया.
कई साल बाद वह ब्राह्मण लौटा और हंसों के बारे में पूछा तो आपने कह दिया कि हंस बीमार होकर मर गए.
आपने तीर्थयात्रा पर गए उस व्यक्ति के साथ विश्वासघात किया जिसने आप पर अंधविश्वास किया था.
आपने प्रजा की धरोहर में डाका डालकर राजधर्म भी नहीं निभाया.
जिह्वा के लालच में पड़कर हंस के सौ बच्चे भूनकर खाने के पाप से आपके सौ पुत्र हुए जो लालच में पड़कर मारे गए.
आप पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाले से झूठ बोलने और राजधर्म का पालन नहीं करने के कारण आप अंधे और राजकाज में विफल व्यक्ति हो गए.
श्रीकृष्ण ने कहा- सबसे बड़ा छल होता है विश्वासघात. आप उसी पाप का फल भोग रहे हैं।
सीख-किसी के साथ विश्वासघात कभी भी नहीं करें।

Sunday, 10 April 2016

Kejriwal jokes!!!

Kejriwal jokes!!!

Rajnikanth is clearly losing ground!

They had to arrive sooner or later, here are a few:

1. Kejriwal is so honest he refuses to have a false ceiling

2. Kejriwal is so honest he wears a helmet while driving his car

3. Kejriwal is so honest that lie detectors are tested by him

4. Kejriwal is so honest he doesn't wear underwear coz it has VIP written over it.

5. Kejriwal is so honest that he doesn't have any LIC policy because honesty is the best policy.

6. Kejriwal is so honest he actually calls a policeman to scare his 
kids, when they don't eat.

7. Kejriwal is so honest he wants to make Sunny Leone the spokesperson of AAP because she has nothing to hide.

8. Kejriwal is so honest that when Raja Harishchandra was a kid, his father used to8 tell him stories about Arvind Kejriwal.

9. Kejriwal is so honest that the Church confesses to him.

Jokes ................ अगर सभी बीवियाँ अपने मर्दों को हफ्ते में एक दिन (संडे को) दारू पीने के लिए खुली छूट दे दें

अगर सभी बीवियाँ अपने मर्दों को हफ्ते में एक दिन (संडे को) दारू पीने के लिए खुली छूट दे दें तो वार्तालाप कैसी होगी।
ब्रेकफास्ट टाइम
पत्नी : अजी नाश्ते में ठंडी किंगफ़िशर लोगे या हेवर्डस 5000।
पति : यार केनन या हंटर नहीं है।
पत्नी : सॉरी लाना भूल गयी।
पति : कोई नहीं डिअर तुम प्यार से जो पिला दो। साथ में कुछ हल्का ही लुंगा चिप्स वगेहरा।
लंच टाइम
पत्नी : अभी लंच में एक घण्टा ही बचा है जो तीन चार विस्की के पेग मारने है मार लीजिये।
एट डिनर
पत्नी : शाम के 7 बज गए अभी तक आप के फ्रेंड्स नहीं आये कब बोतले खुलेंगी कब खाना खाओगे।
पति : क्या पिलाओगी और क्या खिलाओगी आज।
पत्नी : अरे आप भूल गए थे पर मुझे याद था आज ड्राई डे है मैंने कल ही ब्लेंडर्स प्राइड की दो बोतलें आप के लिए ले ली थीं। और शर्माजी की फेवरेट आर सी की भी दो बोतले ले ली थी। फ्रिज में आइस भरपूर है। साथ में कुछ सेमि नॉनवेज आइटम तैयार कर दूंगी। डिनर में बटर चिकन की तैयारी है।
पति : यार सोडा भी ठंडा कर लेना।
पत्नी: तैयार है जी में जानती हूँ आपको वीकेंड पर क्या क्या चाहिए।
दोस्तों क्या कभी ऐसे अच्छे दिन भी आयें
....
 एक पंजाबी दादी अपने पोते को अपने दीर्घायु होने का रहस्य बता रही थी।
 
दादी: अन्नपचन अच्छा होने के लिये मैं बियर लेती थी। भूख लगने के लिये व्हाईट वाईन और जब रक्तदाब कम हो तो रेड वाईन पीती थी।
उच्च रक्तदाब हो तो वोडका और सर्दी हो तो ब्राण्डी लेती थी।
 .
पोता: तो फिर आप पानी कब पीती थी ??  
दादी: हट !!! इतनी बीमार तो मैं कभी पडी ही नही
 

Sunday, 3 April 2016

ज्ञानी जी का ज्ञान............कबीर का बेटा था : कमाल

कबीर का बेटा था : कमाल। कबीर ने उसे नाम ही 'कमाल' दिया—इसीलिये कि कबीर से भी एक कदम आगे छलांग ली उसने। कबीर का ही बेटा था, आगे जाना ही चाहिये। वह बेटा ही क्या जो बाप को पीछे न छोड़े ! हर बाप की यही आकांक्षा होनी चाहिये कि मेरा बेटा मुझे पीछे छोड दे। हर गुरु की यही आकांक्षा होनी चाहिये कि मेरा शिष्य मुझे पीछे छोड दे। यही उसकी सफलता है। यही उसका सौभाग्य है।

कबीर के पास लोग धन ले आते चढ़ाने, सोना ले आते। कबीर कहते, 'नहीं भाई, यह सब तो मिट्टी है। इस मिट्टी को क्या करेंगे, ले जाओ !' कमाल कबीर के झोंपडे के बाहर ही बैठा रहता। वह कहता, 'भैया, मिट्टी लाए और मिट्टी फिर ले जा रहे ! अरे रख जाओ, मिट्टी ही है ! जब मिट्टी ही है तो कहां ले जा रहे हो? एक तो लाने की भूल की, अब कम से कम दूसरी तो भूल न करो। रख दे, रख दे!'

कबीर को लोगों ने शिकायत की, कि आप ऐसे महात्यागी और यह लड़का तो शैतान है ! आप तो भीतर से कह देते हो लोगों को कि यह मिट्टी है, ले जा भाई, हम क्या करेंगे, हम तो फकीर आदमी हैं; और यह लोगों से कहता है कि 'अरे मिट्टी है, कहां ले जा रहे हो? एक तो यहां तक ढोयी, यह कष्ट सहा; अभी भी अज्ञान में पड़े हो? अरे छोड़ दे, रख दे ! यहीं रख दे !' रखवा लेता है।
कबीर ने कहा, 'यह बात तो ठीक नहीं।' कमाल को कहा कि यह बात ठीक नहीं। कमाल ने कहा, ' आप ही कहते हो कि मिट्टी है, तो फिर बात ठीक क्यों नहीं? बेचारों ने यहां तक ढोया, अब उनको फिर ढोने के लिये कह रहे हो ! कुछ तो दया करो ! अरे, दया ममता तो होनी ही चाहिये फकीर में, संन्यासी में !'

कबीर ने कहा कि मेरी तेरी नहीं बनेगी, तू अलग ही एक झोपड़ा बना ले। तो उसने अलग ही झोपड़ा बना लिया। काशी नरेश कबीर के पास आते थे, उन्होंने पूछा, बहुत दिन से कमाल दिखाई नहीं पड़ता; वह तो बाहर ही बैठा रहता था। कबीर ने कहा, 'उसे अलग कर दिया, क्योंकि वह लोगों से धन—पैसा ले लेता था।'

काशी नरेश ने कहा कि देखें, परीक्षा करें। वे गये एक बडा बहुमूल्य हीरा लेकर। कमाल बैठा था अपने झोपड़े में। उन्होंने हीरा चढ़ाया। कमाल ने कहा, ' अरे, क्या पत्थर लाए ! न खा सकते, न पी सकते, क्या पत्थर लाए ! कुछ लाते काम की चीज।'

काशी नरेश ने सोचा, यह तो बात बड़ी गजब की कह रहा है और उसको कबीर ने अलग कर दिया ! उसने उठाकर—वह अपने हीरे को वापिस अपनी जेब में रखने लगे। अरे, कमाल ने कहा, अब छोड़ दों—अरे मूरख, यहां तक ढोया पत्थर, अब कहा ले जा रहा है, रख !

तब काशी नरेश ने समझा कि यह तो आदमी होशियार है ! यह तो बड़ा. अब इससे कुछ कह भी नहीं सकते, क्योंकि इनकार ही अगर करना था कि पत्थर नहीं है तो पहले ही करना था। पहले तो ही भर ली कि ही भई, है तो पत्थर ही, अब कैसे इनकार करें, किस मुंह से इनकार करें? इसने तो खूब फंसाया।

तो काशी नरेश ने पूछा, 'कहां रख दूं?' कमाल ने कहा, 'वही गलती, गलती पर गलती। अरे पत्थर को कोई पूछता है, कहां रख दूं? अभी भी तुम हीरा ही मान रहे हो? अरे कहीं भी रख दो, जहां रखना हो। या पड़ा रहने दो जहां पड़ा है। रखना क्या?'

मगर काशी नरेश भी तय करके आया था कि परीक्षा पूरी कर लेनी उचित है। तो उसने... बहुमूल्य हीरा था, मुश्किल था उसको पड़ा देना... छप्पर में खोंस दिया। पंद्रह दिन बाद लौटा। सोचा उसने कि मैं इधर बाहर लौटा कि इसने हीरा निकाला। पंद्रह दिन बाद वापिस लौटा, इधर उधर की बात की, आया तो पता लगाने था हीरे का। पूछा कि मैं पंद्रह दिन पहले हीरा लाया था, क्या हुआ, हीरे का क्या हुआ? कमाल ने कहा, 'गजब करते हो! कैसा हीरा? कब लाए थे? मैंने तो नहीं देखा।'
काशी नरेश ने कहा, 'अरे हद्द ! मेरे सामने ही झूठ बोल रहे हो ! मेरा वजीर भी मौजूद था, मैं उसको साथ लेकर आया हूं गवाह। तो कबीर ठीक ही कहते हैं कि यह आदमी गड़बड़ है।'
कमाल ने कहा, 'कि अरे, तुम उस पत्थर की बात तो नहीं कर रहे जो एक दिन लाए थे, पंद्रह बीस दिन पहले? उसी पत्थर को हीरा कह रहे हो, अभी भी हीरा कह रहे हो? यह तो तय हो गया था, यह तो निर्णय हो चुका था, पत्थर है।'
काशी नरेश ने कहा, 'हां निर्णय हो गया था, मैं उसको खोंस गया था झोपड़े में। तूने निकाला होगा।'

कमाल ने कहा, 'मुझे क्या पड़ी निकालने की? तुम देख लो। अगर कोई और निकालकर ले गया हो तो मैं कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि मैं कोई पहरेदार नहीं हूं यहां तुम्हारे पत्थरों का। और अगर किसी ने न निकाला हो तो होगा झोपड़े में। नरेश चकित हुआ देखकर, हीरा वहीं के वहीं झोपड़े में खुसा हुआ था। पैरों पर गिर पड़ा कमाल के और कहा, 'मुझे क्षमा कर दो।' पर उसने कहा, 'इसमें क्षमा करने की बात ही क्या है? तुम गलती ही गलती किये चले जा रहे हो। अरे पत्थर है, उसको मैंने नहीं निकाला तो इसमें खूबी की क्या बात है? पत्थर तो बाहर बहुत पड़े हैं। कोई पत्थर बीनने के लिये यहां बैठा हूं। यहां पैरों पर किसलिये पड रहे हो? अगर तुम उसे हीरा ही मानते हो तो भैया ले जाओ और दुबारा इस तरह की चीजें यहां मत लाना।'
हिम्मत तो नहीं पड़ी, ले जाने की काशी नरेश की।

लेकिन यह कमाल कबीर से भी गहरी बात कह रहा है। अगर तुम्हें दिखाई पड़ने लगा कि सोना मिट्टी है, तो फिर मिट्टी और सोने में फर्क ही कहा रह जाएगा? फिर समता का सवाल ही कहां है? अगर सफलता और असफलता सच में ही समान हो गये तो किसको सफलता कहोगे, किसको असफलता कहोगे? किसको प्रशंसा, किसको अपमान?
मेरा स्वर्णिम भारत, ओशो

Saturday, 2 April 2016

ज्ञानी जी का ज्ञान......... पद

सभा सदों ने एक दिन कहा- आपने उन सभी को पद दिया जिन्होंने आपका प्रिय किया था, पर हनुमान जी को कोई पद नहीं मिला. उनके साथ न्याय न हो सका.

श्रीराम तो जानते थे कि हनुमान जी को प्रभु भक्ति के अतिरिक्त कोई इच्छा ही नहीं लेकिन सभा सदों के मन से यह बात निकालनी जरूरी थी कि न्याय में चूक नहीं हुई है.

प्रभु ने हनुमान जी से कहा- आप हमेशा मेरे संकटमोचक रहे हैं. मेरे सभी प्रिय जनों को कोई न कोई पद मिला, पर आप रह गए. आपको जो पद प्रिय हो वह कहिए, मैं आपको वह देना चाहता हूं.

हनुमान जी ने कहा- आपकी असीम अनुकंपा मुझे मिलती रहती है, मुझे इसके अलावा और किसी चीज की आवश्यकता ही नहीं.परंतु भगवान बार-बार हनुमान जी से कोई पद मांगने को कहते रहे. 
हनुमान जी ने कहा- प्रभु आपने सबको एक-एक पद दिया है. मेरा काम एक पद से नहीं चलेगा. क्या आप मुझे दो पद दे सकते हैं ?

प्रभु ने कहा- हनुमान जी आप मांगिए तो सही सर्वस्व आपका है.
हनुमान जी ने कहा- प्रभु पद पाने से मन में मोह और मद आ जाता है. ऐसे पद का क्या लाभ जिससे अहंकार घेर ले.

हनुमान जी ने भगवान के दोनों चरण पकड़ लिए और कहा- प्रभु मुझे तो इन दो पदों की सदैव सेवा का अधिकार चाहिए.