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Tuesday, 15 March 2016

ज्ञानी जी का ज्ञान.................जीवन एक यात्रा है..........& ............मैं तो अपने जीवन से संतुष्ट हूँ

 जीवन एक यात्रा है...

और इस यात्रा में हम अकेले यात्री नहीं है,बल्कि हमारे रिश्तेदार,मित्र संबंधी आदि भी हमारे साथ सहयात्री हैं।


जिनमें कुछ सहयात्री ऐसे हैं,जो हमारी यात्रा में हमारे सहयोगी बन हमारी इस यात्रा को मनोरंजक और सरल बना देते हैं।

लेकिन कुछ यात्री ऐसे भी होते हैं जो हमारे विरोधी बन ना केवल इस यात्रा में बाधक बनते हैं ,बल्कि आगे बढ़ने से भी रोकते हैं ।

ऐसे समय में ऐसे सहयात्रियों का सामना कर अपनी यात्रा में विघ्न डालने की बजाय , उन से किनारा कर उनके प्रति शुभ भावना रखते हुए अपनी जीवन यात्रा पर निरंतर आगे बढ़ते रहना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए ।

जैसे यदि हम सड़क पर चल रहे हैं सामने से एक स्कूटर सवार आ रहा है।वह बार-बार स्कूटर को कभी इधर कभी उधर करता हुआ चल रहा है।उसकी इन हरकतो को देख कर हमारे मन में यही विचार आएगा कि शायद इस व्यक्ति का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है । इसका कोई भरोसा नहीं,कही यह हमें नुकसान ही ना पहुंचा दे।यह सोचकर बजाए हम उससे उलझने के, हम अपने सुरक्षा पर ध्यान देते हैं ।और सड़क छोड़कर एक किनारे पर खड़े हो जाते हैं । उसके निकलते ही हम चैन की सांस लेते हैं ।तो जैसे यहां हमने उस व्यक्ति का सामना करने की बजाए उससे किनारा करना उचित समझा । क्योंकि हम जानते थे कि ऐसे व्यक्ति का सामना करना अपना ही नुकसान करना है ।

ऐसे ही जीवन यात्रा में चलते हुए भाव स्वभाव की टकराहटो से स्वयं को बचा सुरक्षित रखना बहुत जरुरी है । तभी यात्रा आनंदमय हो सकती है ।" "बात अच्छी हो तो उसकी हर जगह चर्चा करो, बुरी हो तो मन में रखो

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एक दिन सुबह पार्क में हरिनाम जप करते समय एक जानकार बूढ़े व्यक्ति ने व्यंगात्मक लहजे में कहा,"बेटा ये उम्र माला करने की नहीं मेहनत करके खाने कमाने और जिम्मेदारी उठाने की है। ये काम तो फिलहाल बुढ़ापे के लिए छोड़ दो।"

मैंने पूछा,"आप कितनी माला करते हैं ?"

वो सकपकाकर बोले,"मैं नहीं करता मैं तो अपने जीवन से संतुष्ट हूँ। "

मैंने कहा,"संतुष्ट तो गधा भी होता है जीवन से क्योंकि वो जानता ही नहीं की संतुष्टि का अर्थ क्या है। वो सोचता है की दिन भर मेहनत करके शाम को २ सूखी रोटी मिल जाना ही संतुष्टि है। उसको नहीं पता की अगर वो मालिक के चुंगल से निकल जाए तो सारे हरे भरे मैदान उसके लिए मुफ्त उपलब्ध हैं।

इसलिए गधे सामान व्यक्ति ही बिना भक्ति के जीवन में संतुष्टि महसूस कर सकता है। क्योंकि उसको नहीं पता कि जन्म मृत्यु बुढ़ापे और बीमारियों से रहित इस भौतिक जीवन से परे एक नित्य शाश्वत जीवन भी है जहाँ हमारा परम पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण से सीधा सम्बन्ध है और वहां जन्म मृत्यु बुढ़ापा और बीमारियां भी नहीं होते।

वो जाने लगे तो मैंने पुकार कर कहा बाबा जी," बुढ़ापे तक जीवित रहेंगे इसका कोई गारंटी कार्ड तो है नहीं और जब जवानी में भगवान में मन नहीं लगाया तो बुढ़ापे में कैसे मन लगेगा ? और रही बात खाने कमाने की तो भक्त लोग कर्म से नहीं भागते वे तो उल्टा एक आम नागरिक से ज्यादा कर्मशील होते हैं क्योंकि वो सबसे बड़े समाज-सेवी होते हैं। वो खुद का जन्म भी सार्थक करते हैं और दूसरों का भी मार्ग दर्शन करते हैं।

मैं कृष्ण का चिंतन करता हूँ और वो मेरे जीवन यापन का चिंतन करेंगे यह पूर्ण विश्वास है मुझे।

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