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Sunday, 1 November 2015

स्वतंत्रता के बाद के सरदार पटेल जी को समझना है तो इस भाषण को सुने और पढ़े.

Deepak Kumar shared Agni Putra's post to the group: Desi.
16 hrs
We need few more Godse to save us from current gandhi type leaders .
God please send our Godse back


 आज मै वल्लभ भाई पटेल की ३ जनवरी १९४८ में कलकत्ता मैदान में ५ लाख लोगो की भीड़ में उनका दिया गया भाषण सुन रहा था.मै चाहता था की कांग्रेस और बीजेपी सरदार पटेल पर भले लड़ते रहे और उनके अंध भक्त यहाँ फेसबुक पर तलवारे निकालते रहे लेकिन यदि स्वतंत्रता के बाद के सरदार पटेल जी को समझना है तो इस भाषण को सुने और पढ़े.इस भाषण में सरदार पटेल जी ने ऐसा कुछ कहा है, जिस के कारण हमको नाथूराम गोडसे को, गांधी जी के हत्यारे के तगमे से, थोड़ा अलग हट के देखना होगा.इतिहास और अदालत में यह दर्ज है कि नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी जी की हत्या, का उद्देश्य, भारत को और दुर्दिन देखने से बचाने के लिए था.हत्या गोडसे कोई आतंकवादी नही थे. वो एक आम शख्स थे, मेरी और आप की तरह, जो गांधी जी को उसी उच्च स्थान पर रक्खे थे, जिस स्थान पर पूरा देश गांधी जी को रक्खे हुए था. बस उनको गांधी जी ही, उस वक्त के भारत में हुए बटवारे और खून खराबे के लिए जिम्मेदार लगे थे क्यों की वही, गोडसे के अनुसार, एक व्यक्ति थे , जो इस को रोक सकते थे.लेकिन गांधी तब तक अव्यवहारिक हो चुके थे और भारत की जनता से, सही बात न कहने और सुनने के कारण, महज एक साल में भारत का बटवारा हो गया था. गांधी जी की हत्या का इरादा तो था लेकिन उस पर आखरी मोहर या यह कह लीजिये अंतिम निर्णय १३ जनवरी १९४८ को गोडसे जी ने लिया था.ऐसा क्या था १३ जनवरी १९४८ को , जिससे गोडसे को लगा कि अब भारत गांधी जी की जिद्द और अव्यावहारिकता की और कीमत नही दे सकता है? दरअसल उस दिन गांधी जी की आमरण अनशन के आगे भारत झुक गया था.उस दिन भारत ने पाकिस्तान को ५५ करोड़ रुपय दे दिए थे. इस रुपय को पाकिस्तान को देने ने के खिलाफ, नेहरू के आलावा, सब थे और इसका कारण भी थासरदार वल्लभ भाई पटेल ने ३ जनवरी १९४८ को कलकत्ता के भाषण में इस बात का खुल के जिक्र किया है और वो ५५ करोड़ पाकिस्तान को देने के तब तक खिलाफ थे जब तक पाकिस्तान कश्मीर में खून खराबा नही बंद कर देता.लेकिन गांधी जी को कश्मीर में हो रहे खून खराबे से कोई मतलब नही था, उन्हें संत बने रहने का जनून था , उन हालातो में, भारत का वर्तमान और भविष्य, उनकी अपनी खुद की सोंच के आगे महत्वहीन हो गया था.अब मै उस भाषण के उस अंश को उद्धृत कर रहा हूँ जिसमे खुद पटेल जी को मसले को लेकर गुस्सा था.."जैसा लोगो का लोकमत हो, वैसा करना चाहिए.......................लेकिन यदि जो कश्मीर में चलता है, उस तरह चलता है, तो लोकमत की क्या जरुरत है ?हम लड़ाई कर के कश्मीर को ले ले तो? लोकमत की जगह कहाँ रही?तो, हम तो कहते है आज भी,लोकमत से करो, लेकिन हमारा सिपाही मरता रहे, हमारा पैसा खर्च करना पड़े और हमारे गाँव के गाँव जलाये जाते रहे और वहां हिन्दू और सिक्खो को तबाह किया जाये तो आखिर फिर लोकमत कहाँ रह गया?आखिर बंदूक से ही लेना होगा तो लेंगे और क्या करेंगे?दूसरी तरह से नही हो सकता है, तो नही!लेकिन हमने एक बात साफ़ की...................., कश्मीर की एक सूत जमीन हम छोड़ने वाले नही है................., कभी नही छोड़ेंगे.".आगे पटेल जी कहते है," तो आप देख लीजिये हमने फैसला किया तो जितनी चीज़ थी उस चीज़ में उदारता से ,हमने जितना उनका हिस्सा था उससे ज्यादा देने की हमने कोशिश की, लेकिन जब हमने उनका रूपया देने का किया तो उस समय हमने कहाँ, यदि आपको ५०० करोड़ रूपया चाहिए और इतना हिस्सा हमारा चाहिए, हम देने के लिए,,आपका हक हो न हो, ज्यादा हम देने को लिए भी हम तैयार है, लेकिन मैंने यह लिख के दिया था, यदि इस रुपये से गोली चलानी हो कश्मीर में, तो इस तरह से हम रुपये नही देंगे. हाँ, तुम्हारे में ताकत हो तो ले जाओ.ठीक है, लेकिन ख़ुशी से रूपया हम तब देंगे, जब फैसला तब होजाये की आपका रूपया है, उसमे कोई हम दखल नही देंगे, हमने आपके साथ मिल कर एक फैसला किया, एक consent डिक्री है, यह तो, कोर्ट में जाना न पड़े, लेकिन आपस में बैठ कर फैसला कर दिया तो यह डिक्री तब बजेगी , यह हुक्मनामा तब बजेगी जब,.हमारा फैसला हो जाये. तो कश्मीर का फैसला हो जाये, तो उस रोज आकर पैसा ले जाओ."यह थी, उस वक्त की आबो हवा भारत की.........उस वक्त की एक अहमक जिद्द ने अब तक भारत को जला रक्खा है. उस वक्त, गांधी जी ने, भारत की जनता और राजनैतिक सच्चाई को नजरंदाज कर के, आमरण अनशन कर के, भारत सरकार को झुका दिया और १३ जनवरी १९४८ को पाकिस्तान को ५५ करोड़ देने का फैसला भारत को करना पड़ा.कश्मीर जलता रहा, लोग मरते रहे , पाकिस्तान यह सब करता रहा लेकिन गांधी जी न महात्मा रह गये थे और ना ही एक राजनैतिज्ञ.मेरा पूरा यकीन है की भले गोली चलाने वाले गोडसे थे, लेकिन गोडसे, कई लोगो के अंदर भी थे. इसीलिए आज के काल में तो गोडसे ज्यादा प्रसंगिक हो गए है.हमे, काल अजीब विरोधाभास दिखा रहा है. जितने दूर दृष्टि वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल थे और उन्हें आगे आने वाली विपत्तियों का पूरा अंदेशा था, वहीं उतना ही गोडसे भी दूर दृष्टि वाले थे और आगे आने वाले समय के लिए आशंकित थे.आज तक गोडसे निन्दिय रहे है, लेकिन उनकी इतिहासिक भूमिका अमिट है. आज उनके लिए निंदा का स्वर मध्यम होता जा रहा है और गांधी जी पर उनके अंतिम काल में लिए गए निर्णयों पर प्रश्न चिन्ह भी लगने लगे है.जैसे चन्द्रशेखर आजाद , भगत सिंह को, भारतीय जन मानस उच्चतम कोटि का देश भक्त और आज़ादी का सपूत मानता है लेकिन उन्ही लोगो की गांधी जी और उनके अनुयायी आलोचना करते रहे थे . इतिहास के कुछ सरकारी ग्रंधो में वो आतंकवादी ही बताये गए है. उसी तरह गोडसे का भी पुनर मूल्याङ्कन करना पड़ेगा.