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Sunday, 18 October 2015

मोक्ष पाने का क्या साधन है ? गुरु नानक देव और पंडित ब्रह्म दास की काश्मीर में वार्ता

मोक्ष पाने का क्या साधन है ?

गुरु नानक देव और पंडित ब्रह्म दास की काश्मीर में वार्ता


  
गुरु नानक पंजाब में अचल बटाला के सिद्धों से मिलकर काशमीर की तरफ चले । कहा जाता है कि आपने पैरों व् सिर को चमड़ों से और शरीर पर रस्सी लपेट रखी थी और माथे पर चंदन का तिलक लगा रखा था जैसे पूजा करने वाले हिन्दू लगाते हैं । काशमीर उस समय विद्वान पण्डितों से जाना जाता था और वह क्षेत्र चारवाहों, नदियों, झीलें और फूलों से सुसज्जित घाटियों और झरनों के लिए प्रसिद्द था । गुरु नानक के साथ हस्सु लौहार और सिहांन छिप्पी भी थे । गुरु साहिब ने एक दिन पहाड़ियों पर स्थित एक गुफा में बिताया जहाँ पर एक मुस्लिम चरवाहा याक और भेड़ों को चरा रहा था । गुरु की और बाकी लोगों की वेशभूषा देखकर मज़ाक के लहज़े में बोला, " क्या आप साधु हो या चोर? अगर आप साधु हो तो शहर में क्यों नहीं जाते? साधु का यहाँ क्या काम? शक्ल से तो आप भले आदमी लगते हो ?" गुरु नानक बोले, "बेटे, अपने जानवरों का ख्याल रखो। " जब वह चला गया तो गुरु साहिब ध्यान-मग्न हो गए । एक घण्टे बाद वह गड़रिया आया और बताया कि उसके सारे जानवर खो गए हैं । उसने काफी ढूँढा लेकिन वो नहीं मिले । उसे लगा कि उसे इन साधु लोगों को मज़ाक उड़ाने का फल मिला है । गुरु नानक ने ध्यान किया और उसे इशारा करके बताया कि उसके जानवर बगल की घाटी में भटक गए हैं और वह उन्हें वहाँ से ला सकता है । वह वहाँ जाकर अपने जानवर ले आया और गुरु का शुक्रिया अदा किया । उसको गुरु की सादगी और चेहरे की चमक बहुत ही भा गयी थी और वह गुरु की वाणी सुनने में मदहोश हो गया । घबरा कर उन जानवरों का मालिक वहाँ पर ढूँढ़ते उसे आया तो वह भी गुरु के दर्शन पाकर निहाल हो गया और रात को वहीं पर रुक गया । 

कुछ दिन वहाँ रुक कर गुरु नानक बिज विहार जो मट्टन (दक्षिण कश्मीर से ६० किमी) में स्थित है, में गए । ब्रह्म दास वहाँ कश्मीरी पण्डितों में सबसे विद्वान पण्डित माना जाता था क्योंकि उसने शास्त्रार्थ में सभी पण्डितों को पराजित कर रखा था । उसे सब हिन्दू ग्रन्थों का (जैसे वेद, पुराण, स्मृति, उपनिषदों आदि) का पूर्ण कंठस्थ ज्ञान था । वह गले में एक भारी शालिग्राम रख कर घूमता था । गुरु साहिब के बारे में जब उसे पता चला तो वह दो गधों पर सँस्कृत के ग्रन्थों को लादकर उनसे शास्त्रार्थ करने के लिए निकल पड़ा । गुरु की पोशाक देखकर बड़ा ही अचम्भित होकर बोला, " यह आपने कैसी पोशाक पहनी है ? फ़क़ीर लोग तो ऐसी पोशाक नहीं पहनते ? आपने यह चमड़ा क्यों धारण किया है, जो दूषित है और शास्त्रों में वर्जित है । आपने यह रस्सी क्यों अपनी देह पर लपेट रखी है? आप दर्शन की कौन सी विचारधारा से सम्बन्ध रखते हो? उस दर्शन की कौन सी किताबें आपने पढ़ी हैं ?"

गुरु नानक साहिब ने ज़बाब दिया:
पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ ॥ 
पड़ि पड़ि बेड़ी पाईऐ पड़ि पड़ि गडीअहि खात ॥ 
पड़ीअहि जेते बरस बरस पड़ीअहि जेते मास ॥ 
पड़ीऐ जेती आरजा पड़ीअहि जेते सास ॥ 
नानक लेखै इक गल होरु हउमै झखणा झाख ॥१॥ 

गुरु नानक साहिब ने कहा कि पढ़-पढ़कर चाहे ग्रन्थों शास्त्रों की गाड़ियाँ भर ली जाएँ और इन ग्रंथों को अपने साथ-साथ लेकर घूमते रहे; चाहे कितनी किताबें पढ़ ली जाएँ जिनसे किश्तियाँ भर जाएँ और बड़े-बड़े तहखाने ग्रंथों से भर लिए जाएँ; चाहे सारा महीना पढ़ते जाएँ, चाहे सारा साल, सारी उम्र, साँस-साँस के साथ पढ़ते जाएँ, परन्तु लेखे में लिखी जाने वाली एक बात केवल राम-नाम का अभ्यास है, अन्य सब पढ़ना-पढ़ाना व्यर्थ की मेहनत करना है । 

गुरु नानक साहिब जी ग्रंथों और शास्त्रों के पाठ-वचार के विरुद्ध नहीं है । यदि ऐसा होता, तो आप न वाणी रचते और न ही गुरु अर्जुन देव आदि ग्रन्थ में अनेक पूर्ण पुरुषों की वाणी का संकलन करते । गुरु साहिब यह समझाने का यत्न कर रहे हैं कि मुक्ति ग्रंथो और शास्त्रों के पढ़ने-पढ़ाने में नहीं, बल्कि उनमें अंकित उपदेशानुसार राम-नाम का सुमिरन करने में है ।

लिखि लिखि पड़िआ ॥ तेता कड़िआ ॥
बहु तीरथ भविआ ॥ तेतो लविआ ॥ 
बहु भेख कीआ देही दुखु दीआ ॥ सहु वे जीआ अपणा कीआ ॥ 
अंनु न खाइआ सादु गवाइआ ॥ बहु दुखु पाइआ दूजा भाइआ ॥ 
बसत्र न पहिरै ॥ अहिनिसि कहरै ॥ 
मोनि विगूता ॥ किउ जागै गुर बिनु सूता ॥ 
पग उपेताणा ॥ अपणा कीआ कमाणा ॥ 
अलु मलु खाई सिरि छाई पाई ॥ 
मूरखि अंधै पति गवाई ॥ विणु नावै किछु थाइ न पाई ॥ 
रहै बेबाणी मड़ी मसाणी ॥ अंधु न जाणै फिरि पछुताणी ॥ (SGGS 467)

पिछले श्लोक के भाव का विस्तार करते हुए गुरु नानक देव जी कहते हैं:
धर्म-ग्रंथों के पाठ-विचार का मतवाला इन पुस्तकों को जितना पढता है और फिर आगे जितना इस पर टीका-टिप्पणी और विवेचना करता है और आगे स्वयं जितना लिखता है, उतना ही अधिक परेशान होता है । जितना अधिक वह तीथों पर जाता है, उतना अधिक वाद-विवाद में पड़ता है । जितने अधिक भेष धारण करता है, शरीर को उतना ही दुःख देता है । वह हठकर्मों और तप साधना द्वारा भी शरीर को दुःख देता है । अब दुःख तो सहन करना ही पडेगा । यह उसका अपना मोल लिया कष्ट है । 
यदि वह अनाज नहीं खाता है, तो अपने मुहँ का स्वाद ख़त्म कर बैठता है । वह द्वैत में खो जाता है जिस कारण उसे अनेक कष्ट सहन करने पड़ते हैं । 
यदि वस्त्र नहीं पहनता और नग्न रहता है, तो दिन-रात शरीर को गर्मी-सर्दी में दुखी रखता है । यदि वह मौन धारण कर लेता है तो भी अपने-आपको ख़्वार करता है । अज्ञानता की नींद में सोया हुआ मौनी, गुरु की कृपा के बिना इस नींद से कैसे जाग सकता है ?

यदि वह पाँव से नंगा रहता है तो इसे जो भी कष्ट पहुँचता है वह अपनी की हुई भूल द्वारा पहुँचता है - वह स्वयं ही कष्टों को न्यौता देता है । यदि वह गंदे पदार्थ खाता है, तो समझो कि अपने सिर पर राख डाल रहा है । इस तरह से अज्ञानी मूर्खों की तरह अपनी इज़्ज़त गवाँ रहा है । राम-नाम के बिना दूसरी कोई करनी प्रभु के घर में स्वीकृत नहीं है । यदि वह उजाड़ों और श्मशानों में रहता है तो अंत में पछताता है । 

जो व्यक्ति प्रभु की कृपा से सतगुरु की शरण प्राप्त करके राम-नाम को मन में बसा लेता है, उसे प्रभु के के साथ मिलाप का सच्चा आनंद प्राप्त हो जाता है । ऐसा भाग्यशाली जीव आशा-निराशा, अच्छे-बुरे आदि हर प्रकार की द्वैत से मुक्त हो जाता है । राम-नाम के दिव्य अमृत से उसके अहंकार का नाश हो जाता है और वह सब इच्छाओं, तृष्णाओं और चिंताओं से मुक्त हो जाता है ।

ब्रह्म दास थोड़ा संतुष्ट हुआ और फिर पूछा, " आप कौन से दर्शन शास्त्र के मत से सम्बन्ध रखते हैं ? मोक्ष पाने का क्या साधन है ?
गुरु साहिब ने फरमाया , "परमेश्वर ने सिर्फ एक ही रास्ता रखा है और उसमें प्रवेश करने का एक ही द्वार है । पूर्ण गुरु ही वह सीढ़ी है जिसके द्वारा इंसान अपने निज घर सचखण्ड पहुँच सकता है । बहुत ही खूबसूरत है वो राम जिसके नाम के प्रभाव से मनुष्य के सब दुःख दूर हो जाते हैं और वह परम आनंद की अवस्था में पहुँच जाता है । वह स्वयंभू है क्योंकि वह स्वयं का कर्ता है और खुद ही अपनी पहचान बख्शता है । उसने ही यह आकाश बनाया और उसने ही यह धरती जो एक दूसरे की छत का काम करते हैं । इस तरह सृष्टि की रचना करके गुप्त राम-नाम को प्रकट किया । उसने ही सूरज-चाँद बनाये और उन्हें अपने चेतन से रोशन किया । उसने ही रात-दिन बनाये और उसकी सृष्टि बहुत ही उम्दा और हसीन है । कितने उम्दा स्वर्ग, लोक और पुरी उसने बनाएं हैं । कितने तरह के राग-रागनियाँ उसकी सृष्टि में हो हैं, कितने ही अमृत के झरने उसके सूक्ष्म और कारण लोक में बह रहे हैं जिसमें निर्मल आत्माएं हँस-रूप में किलोल कर रही हैं । हे मालिक ! मैं कैसे तेरी तारीफ़ करूँ, तू बस तू ही है, तेरा जैसा कोई है ही नहीं । तू ही अपने अटल सिंहासन पर विराजमान है और तो बस जन्म-मरण के फेरे में घूम रहे हैं ।

ब्रह्म दास ने फिर प्रश्न किया, "क्या आप जानते हैं कि ये संसार कैसे बना ? शुरू में क्या था और क्या नहीं था ?"

गुरु नानक देव ने फरमाया, "अनेक युग अन्धकार छाया रहा, सृष्टि का कोई नाम-निशान नहीं था । उस समय सुन्न-समाधि में मग्न परमात्मा था या उसके सर्वव्यापक हुक्म के सिवाय और कुछ भी न था । चन्द्र-सूर्य, धरती और तारे नहीं थे, इसलिए दिन-रात भी नहीं थे । पाँच तत्व भी नहीं बने थे और न ही उत्पादन और व्यय के साधन थे । सागर, नदियाँ, खण्ड या पाताल आदि भी नहीं बने थे । ब्रह्मा, विष्णु और महेश, देवी-देवता भी नहीं थे, इसलिए जन्म-मरण, स्वर्ग-नरक, उदय-अस्त, नर-नारी, सुख-दुःख का द्वैत भी पैदा नहीं हुआ था । उस एक परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था । न कोई जपी-तपी, सिद्ध-साधक, योगी-जंगम थे और न ही किसी प्रकार के जप-तप और पूजा-पाठ थे । उस समय अपने आपसे प्रकट हुआ परमात्मा स्वयं ही अपने आनंद में मग्न था । अपनी महिमा का मूल्य वह स्वयं ही परख रहा था । उस समय किसी प्रकार की पवित्रता-अपवित्रता, तन्त्र-मन्त्र, कर्म-धर्म, जाति-पाँति, मोह-माया आदि का जन्म नहीं हुआ था । गोपी-कृष्ण, गोरख-मछिन्द्र, ज्ञान-ध्यान, गाय-गायत्री, होम-यज्ञ, तीर्थ-व्रत, मुल्ला-क़ाज़ी, शेख-हाजी, राजा-प्रजा, वेद-कतेब, मन्दिर-मस्जिद, शिव-शक्ति, पूजा-भक्ति का भी नामों-निशान नहीं था । जब जन्म-मरण ही नहीं था और नेकी-बदेी का ख्याल ही नहीं पैदा हुआ था तो कर्म और फल का क्रम कैसे शुरू हो सकता है ? जब पूजा-भक्ति का ही पता न था तो धर्म और धर्म-स्थानों के आपसी विरोध की कैसे गुंजाइश हो सकती है ।

उस समय पूर्ण अद्वैत था । वह परमात्मा स्वयं ही शाह था और स्वयं ही बंजारा था । वह स्वयं ही करण-कारण था । वह स्वयं ही कहने वाला और सुनने वाला था । वह स्वयं ही साधक था और स्वयं ही इष्ट था । 
जब उसका हुक्म और मौज़ हुई तो उसने इस संसार की रचना की और बिना सहारे के रहनेवाला आकाश बना दिया । उसने स्वयं ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा शक्ति या माया को पैदा किया, जिन्होनें आगे सारा मोह और माया का द्वैतमय प्रसार कर दिया । 
जिस परमात्मा ने इस मोह और माया को पैदा किया, उसीने इसमें से निकलने का भी सामान स्वयं तैयार कर दिया । जिन जीवों को उसने अपने हुक्म या इच्छा से सतगुरु द्वारा सच्चे राम-नाम का बोध करा दिया, वे अलख प्रभु को लखने और अगम की गम्यता पाने के योग्य बन गए । संसार में कोई भी जीव अपने आप पत्मात्मा का ज्ञान नहीं पा सकता । बिरले सौभाग्यशाली जीव हैं, सतगुरु के दिव्य राम-नाम द्वारा अलख, अगम और अगाह पत्मात्मा का भेद प्राप्त होता है । वे लोग सदा के लिए परमात्मा में समा जाते हैं । उस आनंद-रूप कर्ता में समा कर वे भी सहज आनंद को प्राप्त हो जाते हैं ।

पंडित ब्रह्म दास गुरु के वचनों से प्रभावित तो हुआ पर उसका अहं भाव अभी भी जोर मार रहा था । क्योंकि जो कुछ अभी तक उसने ज्ञान किताबे पढ़ कर अर्जित किया, वह गुरु के वचनों के सामने एक खंडहर हुई इमारत की तरह ढहता प्रतीत हो रहा था । उसकी अंतरात्मा यह मानते हुए सकुचा रही थी कि उसकी विचारधारा बहुत ही खोखली थी और वह नितांत मूर्ख सिद्ध हो रहा था । गुरु साहिब उसकी मनोदशा को भाँपते हुए बोले कि वह कोई गुरु धारण करे जिससे उसके संशय दूर हो जाये। 

लेकिन ब्रह्म दास अभी भी अपने ज्ञान का अहंकार छोड़ नहीं पाया थे और बोला, "मुझे गुरु बनाने की ज़रुरत क्या है ? पूरे काश्मीर में मुझसे ज्ञान कौन है ? किसको गुरु बनाऊँ ? गुरु साहिब ने उसे जंगल में एक जगह का रास्ता बताया और कहा कि वहाँ चार फ़कीर रहते हैं, वह तुम्हें गुरु का रास्ता बतायेंगें । ब्रह्म दास को अब तक सही रास्ता पाने की ललक उठ चुकी थी । वह जब उन साधुओं से मिला तो उन्होनें उसे एक पहाड़ी के ऊपर एक पुराने मन्दिर के पास जाने को कहा और कहा कि तुम्हारे गुरु वहीँ मिलेंगें । जब वह मंदिर पहुँचा तो देखा वहाँ एक बहुत ही सुन्दर स्त्री नग्न अवस्था में खड़ी है और ब्रह्म दास को देखते ही उसे गाली-गलौंच करने लगी और फिर उसे जूते से पीटने लगी । उससे कहने लगी कि मैंने जन्म-जन्म से तुम्हारा साथ निभाया था और अब क्यों उसे छोड़कर गुरु नानक के पास चले गए । जब ब्रह्म दास वहाँ से जान बचाकर उन फ़क़ीरों के पास आया और उसका मतलब पूछा तो उन्होनें बताया कि वह माया थी जिसे तुमने अपना गुरु बना रखा है । ब्रह्म दास को अब अपनी असलियत का आभास हुआ । उसने मन ही मन महसूस किया कि इतना किताबी ज्ञान के बाद भी उसके मन से काम-वासना, आशा-तृष्णा, राग-द्वेष अभी तक वैसे ही वैसे हैं और वह अंतर से अभी भी मन का गुलाम है । उसे अपनी क्षीणता का अहसास हुआ और जाकर गुरु नानक के चरणों में गिर पड़ा । 

गुरु साहिब ने कहा, "पढ़ाई से बुद्धिमानी या समझ नहीं आती है । समझ अनुभव से आती है और अनुभव आध्यात्मिक अनुशासन और साधन से आता है आर जब वह दीनता और प्रेम से किया जाता है तब परमेश्वर की अपार दया होती है और मोक्ष मिल जाता है । "

ब्रह्म दास ने गुरु से दीक्षा लेकर अपना जीवन परमेश्वर के ध्यान और लोगों की सेवा में लगा दिया ।

MCI Decides Specific Fine And Punishment For Doctors Accepting Gifts And Bribes From Pharma Companies

The original MCI Code of Ethics tells that doctors should not receive cash or gifts from pharmaceutical companies or any healthcare representative. Subsequently the doctors convicted were discharged after issuance of warning if they apologized.

One and half year back a proposal was passed by MCI general body and ethics committee to define clear punishment for doctors accepting kickbacks as gifts, cash or travel facility etc from pharma companies. This was subsequently agreed by the union ministry of health and family welfare. 

The Indian Medical Council (Professional Conduct, Etiquette and Ethics) Regulations, 2002 was amended accordingly. This is what amendment proposes -

bribes or gifts worth 1000 to 5000 - Warning to the doctor
bribes or gifts worth 5000 to 10000 - Suspension from state medical council for 3 months
bribes or gifts worth 10000 to 50000 - Suspension from state medical council for 6 months
bribes or gifts over 50000 - Suspension from state medical council for 1 year
However, no progress on its implementation has been made so far because a gazette notification for the same is awaited since then. The delay has been attributed to administrative issues.