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Wednesday, 14 October 2015

Urgent Attention Please .............. Prescription Format issued by MCI for Doctors .............

MCI will issue standard prescription format for allopathic doctors to boost an accurate, uniform, standard and clear prescription for the sake of patient safety. The new format, prepared by MCI, is applicable for all doctors who practice allopathy in the country.

MCI-affiliated doctors are expected to start using the new format from April onwards. 




MCI is a statutory body having powers to suspend the license of a doctor who is found guilty of malpractice. 
The new format will be made available on the website of MCI.

This standard hard copy format is very much required for prescribing medicines in the interest of patient safety.

 The format also offers the physician to write generic medicines based on the efficacy, affordability and availability of drugs.

As per the new guidelines, allopathic doctors must write prescriptions legibly and in capital letters as well as furnish a complete and detailed prescription. 

The physicians have to also mandatorily mention the patient's address and keep blank space in which the pharmacist can specify his/her address. 

The comprehensive format includes the doctor's full name, his/her qualification, patient's details, name of the generic medicine or its equivalent along with the dosage, strength, dosage form and instruction, name and address of medical store with pharmacist's name and date of dispensing, as well as the doctor's signature and stamp.

Experts say that doctors in some countries, including the United States, print out prescriptions for the sake of clarity. 
In several countries, printed prescriptions are mandatory because they are not only legible, but also constitute a database of medication that the patient has taken over the years.
This is in consonance to the trend picking up for patients looking at online websites also likeHelpingDoc.com, Ask4Healthcare, bookmydoctor.com, Lybrate offering doctor appointment and consultation. 

Sometimes patients need not to visit India for the consultation, they get advice by the senior medical consultant through internet." 
This may be some good news for Indian patients as the overall cost of in-person primary physician appointment is high than compared to online appointments.
 E-visits or online consultation is gaining traction in the US. 
 "Online consulting is permissible but a standard prescription format will always offer authenticity and clarity in the form of doctor's stamp and signature."

ॐ नवरात्र में आदि शक्ति नवदुर्गा की पूजा अर्चना करने की विस्तृत जानकारी

ॐ नवरात्र में आदि शक्ति नवदुर्गा की पूजा अर्चना करने की विस्तृत जानकारी 

  





नवरात्र के सभी दिन मां दुर्गा की पूजा अलग-अलग रूपों में की जाती है.   ये आलेख आपको पूर्ण संतुष्टि देगी नवरात्री के बारें में जानने वालों के लिए और करने वालों के लिए.. 

जय माता दी  मारकण्डेय पुराण के अनुसार दुर्गा अपने पूर्व जन्म में प्रजापति रक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। जब दुर्गा का नाम ' सती ' था। इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवताओं को भाग लेने हेतु आमंत्रण भेजा , किन्तु भगवान शंकर को आमंत्रण नहीं भेजा। सती के अपने पिता का यज्ञ देखने और वहां जाकर परिवार के सदस्यों से मिलने का आग्रह करते देख भगवान शंकर ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुंच कर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम से बातचीत नहीं कर रहा है। उन्होंने देखा कि वहां भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। पिता दक्ष ने भी भगवान के प्रति अपमानजनक वचन कहे। यह सब देख कर सती का मन ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। वह अपने पति  का अपमान न सह सकीं और उन्होंने अपने आपको यज्ञ में जला कर भस्म कर लिया। 

अगले जन्म में सती ने नव दुर्गा के रूप धारण कर के जन्म लिया , जिनके नाम हैं:- 
1.शैलपुत्री 
2. ब्रहमचारिणी 
3. चन्द्रघंटा 
4. कूष्मांडा 
5. स्कन्दमाता 
6. कात्यायनी 
7. कालरात्रि 
8. महागौरी 
9. सिद्धिदात्री। 

जब देव और दानव युद्ध में देवतागण परास्त हो गये तो उन्होंने आदि शक्ति का आवाहन किया और एक एक करके उपरोक्त नौ दुर्गाओं ने युद्ध भूमि में उतरकर अपनी रणनीति से धरती और स्वर्ग लोक में छाये हुए दानवों का संहार किया। इनकी इस अपार शक्ति को स्थायी रूप देने के लिए देवताओं ने धरती पर चैत्र और आश्विन मास में नवरात्रों में इन्हीं देवीयों की पूजा अर्चना करने का प्रावधान किया। वैदिक युग की यही परम्परा आज भी बरकरार है। साल में रबि और खरीफ की फसले कट जाने के बाद अन्न का पहला भोग नवरात्रों में इन्हीं देवियों के नाम से अर्पित किया जाता है। आदि शक्ति दुर्गा के इन नौ स्वरूपों को प्रतिपदा से लेकर नवमी तक देवी के मण्डपों में क्रमवार पूजा जाता है। दुर्गा सप्तशती के अन्तर्गत देव दानव युद्ध का विस्तृत वर्णन है। इसमें देवी भगवती और मां पार्वती ने किस प्रकार से देवताओं के साम्राज्य को स्थापित करने के लिए तीनों लोकों में उत्पात मचाने वाले महादानव से लोहा लिया इसका वर्णन आता है। यही कारण है कि आज सारे भारत में हर जगह दुर्गा यानि नवदुर्गाओं के मन्दिर स्थपित हैं और साल में दो बार नौ दिन के लिए उत्तर से दक्षिण तक उत्सव का माहौल होता है। सम्पूर्ण दुर्गासप्तशती का अगर पाठ न भी कर सकें तो निम्नलिखित सप्तश्लोकी पाठ को पढ़ने से सम्पूर्ण दुर्गासप्तशती और नवदुर्गाओं के पूजन का फल प्राप्त हो जाता है। 


ओम् ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। 
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।।1।। 
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः 
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभांव ददासि। 
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या 
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।। 2।। 
सर्वमंगलमंगलये शिवे सर्वार्थसाधिके। 
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि नमोऽतु ते।।3।। 
शरणांगतदीन आर्त परित्राण परायणे 
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।। 4।। 
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। 
भयेभ्यारत्नाहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते।।5।। 
रोगान शेषान पहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान् सकलानाभीष्टान्। त्यामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता श्रयतां प्रयान्ति।। 6।। सर्वाधाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। 
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्।। 7।। 

वैसे तो दुर्गा के 108 नाम गिनाये जाते हैं लेकिन नवरात्रों में उनके स्थूल रूप को ध्यान में रखते हुए नौ दुर्गाओं की स्तुति और पूजा पाठ करने का गुप्त मंत्र ब्रहमा जी ने अपने पौत्र मार्कण्डेय ऋषि को दिया। इसको देवी कवच भी कहते हैं। देवी कवच का पूरा पाठ दुर्गा सप्तशती के 56 श्लोकों के अन्दर मिलता है। नौ दुर्गाओं के स्वरूप का वर्णन ब्रहमा जी ने इस प्रकार से किया है। 

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रहमचारिणी। 
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। 
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। 
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम।।। 
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। 
उक्तान्येतानि नामानि ब्रहमणैव महात्मना।। 
अग्निना दमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। 
विषमें दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः।। 

उपरोक्त नौ दुर्गाओं ने देव दानव युद्ध में विशेष भूमिका निभाई है इनकी सम्पूर्ण कथा देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण में लिखित है। शिव पुराण में भी इन दुर्गाओं के उत्पन्न होने की कथा का वर्णन आता है कि कैसे हिमालय राज की पुत्री पार्वती ने अपने भक्तों को सुरक्षित रखने के लिए तथा धरती आकाश पाताल में सुख शान्ति स्थापित करने के लिए दानवों राक्षसों और आतंक फैलाने वाले तत्वों को नष्ट करने की प्रतीज्ञा की ओर समस्त नवदुर्गाओं को विस्तारित करके उनके 108 रूप धारण करने से तीनों लोकों में दानव और राक्षस साम्राज्य का अन्त किया। 
इन नौदुर्गाओं में सबसे प्रथम देवी का नाम है शैल पुत्री जिसकी पूजा नवरात्र के पहले दिन होती है। 
दूसरी देवी का नाम है ब्रह्मचारिणी जिसकी पूजा नवरात्र के दूसरे दिन होती है। 
तीसरी देवी का नाम है चन्द्रघण्टा जिसकी पूजा नवरात्र के तीसरे दिन होती है। 
चौथी देवी का नाम है कूष्माण्डा जिसकी पूजा नवरात्र के चौथे दिन होती है। 
पांचवी दुर्गा का नाम है स्कन्दमाता जिसकी पूजा नवरात्र के पांचवें दिन होती है। 
छठी दुर्गा का नाम है कात्यायनी जिसकी पूजा नवरात्र के छठे दिन होती है। 
सातवी दुर्गा का नाम है कालरात्रि जिसकी पूजा नवरात्र के सातवें दिन होती है। 
आठवीं देवी का नाम है महागौरी जिसकी पूजा नवरात्र के आठवें दिन होती है। 
नवीं दुर्गा का नाम है सिद्धिदात्री जिसकी पूजा नवरात्र के अन्तिम दिन होती है। 
इन सभी दुर्गाओं के प्रकट होने और इनके कार्यक्षेत्र की बहुत लम्बी चौड़ी कथा और फेहरिस्त है। लेकिन यहां हम संक्षेप में ही उनकी पूजा अर्चना का वर्णन कर सकेंगे। 



पहला दिन शैलपुत्री देवी की पूजा :  



 मां दुर्गा का पहला स्वरूप शैलपुत्री का है। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण इनको शैलपुत्री कहा गया। यह वृषभ पर आरूढ़ दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल पुष्प धारण किए हुए हैं। यह नव दुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। नवरात्र पूजन में पहले दिन इन्हीं का पूजन होता है। प्रथम दिन की पूजा में योगीजन अपने मन को ' मूलाधार ' चक्र में स्थिति करते हैं। यही से उनकी योग साधना शुरू होती है। 
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। 
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।। 
श्रद्धालु जनों की सूचना के लिए यह भी जरूरी है कि दुर्गा पूजन सामग्री में घटस्थापन सबसे महत्वपूर्ण होता है। व्रत और उपवास लेने की परम्परा प्राचीनकाल से ही है इस व्रत में फलाहार के कोई विशेष नियम नहीं हैं युवा हो या युवती बालक हो या वृद्ध सबको ही जगदम्बा की कृपा प्राप्त करने के लिए नवरात्रों में दुर्गा सप्तशती अवश्य पढ़नी चाहिए। घटस्थापन और पूजा पाठ में निम्नलिखत सामग्री पहले से ही व्यवस्था करके रख लेनी चाहिए।  

घटस्थापन हेतु- 
गंगा जल , नारियल , लाल कपड़ा , मौली , रौली , चन्दन , पान , सुपारी , धूपबत्ती , घी का दीपक , ताजे फल , फल माला , बेलपत्रों की माला , एक थाली में साफ चावल , घटस्थापन के स्थान में केले का खम्बा , घर के दरवाजे पर बन्दनवार के लिए आम के पत्ते , तांबे या मिटटी का एक घड़ा , चन्दन की लकड़ी , सयौंषघि , हल्दी की गांठ , 5 प्रकार के रत्न , देवी को स्नान के उपरान्त पहनाने के लिए उसकी मूर्ति के अनुसार लाल कपड़े , मिठाई , बताशा , सुगन्धित तेल , सिन्दूर , कंघा दर्पण आरती के लिए कपूर 5 प्रकार के फल पंचामृत जिसमें दूध दही शहद चीनी और गंगाजल हो , साथ ही पंच गव्य , जिसमें गाय का गोबर गाय का मूत्र गाय का दूध गाय का दही गाय का घी , भी पूजा सामग्री में रखना आवश्यक है। दुर्गा जी की स्वर्ण मूर्ति या ताम्र मूर्ति अगर ये भी उपलब्ध न हो सके तो मिटटी की मूर्ति अवश्य होनी चाहिए जिसको रंग आदि से चित्रित किया हो चूंकि नवदुर्गायें वस्त्र आभूषण और नैवेद्य प्रिय हैं अतः उनको पहनाने के लिए रोज रोज नये वस्त्र आभूषण जिनमें गले का हार हाथ की चूड़ियां कंगन मांग टीका नथ और कर्णफूल आदि आते हैं का भी आयोजन करके रखना। ये सभी सामग्री नौ दिन में नवदुर्गाओं को पूजा के दौरान समर्पित की जायेंगी। उपरोक्त सामग्री का संचयन करके रात्रिकाल में देवी का भव्य मंडप बनाकर उसे वस्त्र आभूषण पहनाने के उपरान्त फलफूल आदि अर्पित करके कीर्तन करते हुए माता का गुणगान करें। यही माता वैष्णव देवी कामाख्या सप्तपीठ और दक्षिण भारत के विभिन्न अंचलों में सदैव विराजमान रहती हैं। शैलपुत्री के रूप में हो चाहे दुर्गा माता के रूप में आप नित्य ही नौ दिन तक अपने घर या देवालय में जाकर नवरात्रों में नवदुर्गाओं की पूजा अर्चना का पुण्य लाभ कमा सकते हैं। अन्त में कपूर और घी के दिये को थाली में सजाकर आरती करनी होगी। 
दुर्गामाता की आरती सभी जगह प्रचलित है आरती को कंठस्थ करके भी रखा जा सकता है। 


अम्बे तू है जगदम्बे काली , जय दुर्गे खप्पर वाली। 
तेरे ही गुणगायें भारती ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती।। 
तेरे भक्त जनों पर मेया भीर पड़ी है। भारी , 
दानव दल पर टूट पड़ो मां करके सिंह सवारी।। 
सौ-सौ सिंहों से बलशाली अष्टभुजाओं वाली। 
दुखियों के दुख को निवारती।। 
ओ मैया-- मां बेटे का है इस जग में बड़ा ही निर्मल नाता। 
पूत कपूत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता।। 
सब पर करूणा दरशाने वाली अमृत बरसाने वाली। 
भक्तों के दुखड़े निवारती।। 
ओ मैया -- नहीं मांगते धन और दौलत ना चांदी ना सोना। 
हम तो मांगे तेरे मन में एक छोटा सा कोना।। 
सबकी बिगड़ी बनाने वाली लाज बचाने वाली। 
सतियों के सत को संवारती।। ओ मैया-- 

इसके अलावा एक दूसरी प्रचलित आरती ओर भी है। जिसके आरंभ की पंक्तियां हैं - 
ओम जय अम्बे मैया जै श्यामा गौरी , 
तुमको निशि दिन ध्यावत हरी ब्रहमा शिवजी।। 

इन सभी आरतियों की बाजार में पुस्तक मिलती है जिसे नवरात्र के दौरान संग्रह करके रखना उत्तम होता है। शैलपुत्री की पूजा अर्चना के बाद कलश पूजा अवश्य करे। 


दूसरा दिन ब्रहमचारिणी देवी की पूजा :    



मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां '' ब्रहम '' शब्द का अर्थ तपस्या से है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इनके बाएं हाथ में कमण्डल और दाएं हाथ में जप की माला रहती है। मां दुर्गा का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल प्रदान करने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप , त्याग , वैराग्य , सदाचार , संयम की वृद्धि होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन '' स्वाधिष्ठान '' चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। 

दधाना कपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। 

देवी प्रसीदतु मयि ब्रहमचारिण्यनुत्तमा। 


इन नवदुर्गाओं का वास्तविक व्यक्तित्व दुर्गा सप्तशती के देवी कवच में वर्णित है। ये सभी देवियां जिनको भक्तिपूर्वक स्मरण किया जाता है उनका निश्चय ही उद्धार करती हैं। देव दानव युद्ध के दौरान इनका जो स्वरूप और सवारी का वर्णन है वह इस प्रकार है जैसे कि चामुण्डा देवी प्रेत पर आरूढ़ होती है वाराही भैंसे पर सवारी करती है। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरूड पर ही आसन जमाती है। माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं। कौमारी का वाहन मयूर है। भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मीदेवी कमल के आसन पर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं। वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राहमी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं। इस प्रकार ये सभी माताएं सब प्रकार की योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत सी देवियां हैं जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं। ये सम्पूर्ण देवियां क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिये रथ पर बैठी दिखायी देती हैं। ये शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मुसल खेटक और तोमर परशु तथा पाश कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शार्गधनुष आदि अस्त्र शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना यही उनके शस्त्र धारण का उद्देश्य है। देवी का द्वितीय स्वरूप ब्रहमचारिणी प्रतीक रूप में नवदुर्गाओं कीं दूसरी ऐसी अमोघ शक्ति है जिसने 108 दुर्गाओं में अपने विभिन्न रूप लेकर इस संसार में महाविद्या और महाबल जैसे शास्त्र और शस्त्र का निर्माण किया जिस प्रकार देवताओं में ज्ञान और वेदों के निर्माण कर्ता ब्रहमा जी हैं ऐसे ही आज के युग में मंत्र शक्ति और रचना विधान का नाम ब्रहमचारिणी है। इसकी पूजा अर्चना द्वितीया तिथि के दौरान की जाती है। सचिदानन्दमय ब्रहमस्वरूप की प्राप्ति कराना आदि विद्याओं की ज्ञाता ब्रहमचारिणी इस लोक के समस्त चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता है। इसका स्वरूप स्वेत वस्त्र में लिप्टी हुई कन्या के रूप में है। जिसके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल विराजमान है। यह अक्षयमाला और कमंडल धारिणी ब्रहमचारिणी नामक दुर्गा शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र मंत्र आदि से संयुक्त है। अपने भक्तों को यह अपनी सर्वज्ञ सम्पन्न विद्या देकर विजयी बनाती है। ब्रहमचारिणी का स्वरूप बहुत ही सादा और भव्य है। मात्र एक हाथ में कमण्डल और दूसरे हाथ में चन्दन माला लिये हुए प्रसन्न मुद्रा में भक्तों को आशीर्वाद दे रही हैं। अन्य देवियों की तुलना में वह अतिसौम्य क्रोध रहित और तुरन्त वरदान देने वाली देवी हैं। नवरात्र के दूसरे दिन सांयकाल के समय देवी के मण्डपों में ब्रहचारिणी दुर्गा का स्वरूप बनाकर उसे सफेद वस्त्र पहनाकर हाथ में कमण्डल और चन्दन माला देने के उपरान्त फल फूल एवं धूप दीप नैवेद्य अर्पित करके आरती करने का विधान है। इस देवी के लिए भी वही जगदम्बा की आरती की जायेगी जो पहली देवी शैलपुत्री के अर्चना और पूजन के दौरान की गई। 


तीसरा दिन चन्द्रघण्टा नामक दुर्गा के लिए :    




मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम '' चन्द्रघण्टा '' है। नवरात्र उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन आराधना की जाती है। इनका स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घण्टेके आकार का अर्धचन्द्र है। इसी कारण इस देवी का नाम चन्द्रघण्टा पड़ा है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनका वाहन सिंह है। हमें चाहिए कि हम मन वचन कर्म एवं शरीर से शुद्ध होकर विधि विधान के अनुसार मां चन्द्रघण्टा की शरण लेकर उनकी उपासना आराधना में तत्पर हों। इनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से छूटकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं। 

पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। 

प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।। 


तृतीय दुर्गा चन्द्रघंटा शक्ति के रूप में विराजमान चन्द्र घंटा मस्तक पर चन्द्रमा को धारण किये हुए है। नवरात्र के तीसरे दिन इनकी पूजा अर्चना भक्तों को जन्मजन्मान्तर के कष्टों से मुक्त कर इहलोक और परलोक में कल्याण प्रदान करती है। देवी स्वरूप चन्द्रघंटा बाघ की सवारी करती है। इसके दस हाथों में कमल धनुष बाण कमंडल तलवार त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र हैं। इसके कंठ में स्वेत पुष्प की माला और रत्नजडित मुकुट शीर्ष पर विराजमान है। अपने दोनों हाथों से यह साधकों को चिरआयु आरोग्य और सुख सम्पदा का वरदान देती है। देव दानव युद्ध के दौरान देवताओं और राक्षसों में सौ वर्ष तक छलबल और शक्ति बल से युद्ध चलता रहा। राक्षसों के स्वामी महिषासुर नामक दैत्य था। जबकि देवताओं के स्वामी इन्द्र थे। इस युद्ध में कई बार देवताओं की सेना राक्षसों से पराजित हो गई ओर एक समय ऐसा आया जब देवताओं पर विजय प्राप्त कर महिषासुर स्वयं इन्द्र बन बैठा। सभी देवता जब पराजित हो गये तो ब्रहमा जी के नेतृत्व में मंत्रणा करने के लिए भगवान विष्णु और भगवान शंकर की शरण में गये। देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने सूर्य इन्द्र अग्नि वायु चन्द्रमा यम वरूण तथा अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिये हैं और उनको बन्धक बनाकर स्वयं स्वर्गलोक का राजा बन गया है। देवता महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण कर रहे हैं। अब हम कहां जायें। ऐसी दीनवाणी सुनकर भगवान विष्णु और भगवान शिव अत्यधिक क्रोध से भर गये। इसी समय ब्रहमा विष्णु और शिव के मुंह से क्रोध के कारण एक महान तेज प्रकट हुआ। ओर अन्य देवताओं के शरीर से भी एक तेजोमय शक्ति मिलकर एकाकार हो गई। यह तेजोमय शक्ति एक पहाड़ यानि पर्वत के समान थी ओर उसकी ज्वालायें दशों दिशाओं में व्याप्त होने लगी। यह तेजपुंज सभी देवताओं के शरीर से प्रकट होने के कारण एक अलग ही स्वरूप लिये हुए था और उसके प्रकाश से तीनों लोग भर गये। तभी भगवान शंकर के तेज से उस देवी का मुख मण्डल प्रकट हुआ यमराज के तेज से देवी के बाल प्रकट हुए भगवान विष्णु के तेज से देवी की भुजाएं प्रकट हुई चन्द्रमा के तेज से देवी के दोनों स्तन उत्पन्न हुए इन्द्र के तेज से उसका कटि और उदर प्रदेश प्रकट हुआ वरूण के तेज से देवी की जंघायें तथा ऊरू स्थल प्रकट हुए। पृथ्वी के तेज से नितम्बों का निर्माण हुआ। ब्रहमा जी के तेज से देवी के दोनों चरण और सूर्य के तेज से चरणों की उंगलियां ओर वसुओं के तेज से हाथों की उंगलियां पैदा हुई। इसी प्रकार कुबेर के तेज से नासिका यानि नाक का निर्माण हुआ। प्रजापति के तेज से दांतों का सन्ध्याओं के तेज से दोनों भौंए तथा वायु के तेज से दोनों कानों का निर्माण हुआ। इस प्रकार सभी देवताओं के तेज से उस कल्याणकारी देवी जिसका नाम बाद में महिषासुर मर्दिनी पड़ा का प्रादुर्भाव हुआ। समस्त देवताओं के तेज पुज से प्रकट हुई देवी को देखकर पीड़ित देवताओं की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। भगवान शिव ने अपने त्रिशूल में से एक त्रिशूल देवी को दिया। भगवान विष्णु ने अपने चक्र में से एक चक्र देवी को प्रदान किया। इसी प्रकार सभी देवी देवताओं ने अनेक प्रकार अस्त्र शस्त्र देवी के हाथों में सजा दिये। इन्द्र ने अपने वज्र और ऐरावत हाथी से उतर कर एक घण्टा देवी को दिया। सूर्य ने अपने रोम कूपों और किरणों का तेज भरकर ढाल तलवार और दिव्य सिंह यानि शेर को सवारी के लिए उस देवी को अर्पित कर दिया। विश्वकर्मा ने कई अभेद्य कवच और अस्त्र देकर महिषासुर मर्दिनी नामक इस भगवती को सभी प्रकार के बड़े और छोटे अस्त्रों से शोभित किया। थोड़ी देर बाद महिषासुर ने देखा कि एक विशालकाय रूपवान स्त्री अनेक भुजाओं वाली और अस्त्र शस्त्र से सज्जित होकर और शेर पर बैठकर अट्टहास कर रही है। थोड़ी देर बाद महिषासुर की सेना का सेनापति आगे बढ़कर देवी के साथ युद्ध करने लगा। उधर उदग्र नामक महादैत्य भी 60 हजार राक्षसों को लेकर युद्ध में कूद पड़ा। महानु नामक दैत्य एक करोड़ रथियों को लेकर अशीलोमा नामक पांच करोड़ सैनिकों को लेकर जब युद्ध करने लगा तो वास्कल नामक राक्षस 60 लाख सैनिकों के साथ युद्ध में कूद पड़ा। सारे देवता एक तरफ इस महायुद्ध को देखने के लिए कोतुहल से खड़े थे। कुछ राक्षसों ने देवी पर अपनी शक्तियों से उत्पन्न अस्त्र शस्त्र आदि फैंके लेकिन देवी भगवती ने राक्षसों द्वारा फैंके गये अस्त्र शस्त्रों को इस प्रकार काट डाला मानो कोई गाजर मूली काट रहा हो। थोड़ी देर बाद महिषासुर मर्दिनी यानि देवी भगवती अपने शस्त्रों द्वारा राक्षसों की सेना को निशाना बनाने लगी ओर उनका वाहन शेर भी क्रोधित होकर दहाड़ें मारकर राक्षसों की सेना में इस तरह से प्रचण्ड होकर घूमने लगा जैसे कि जंगल में आग लग गई हो। शेर के श्वांस से सैकड़ों हजारों गण पैदा हो गये उनमें खग भिन्दीपाल परशु पटटीस आदि भी राक्षसों की सेना पर टूट पड़े। देवी भगवती ने त्रिशूल गदा और अन्य शस्त्रों से आक्रमण कर दिया रणचंडीका देवी ने तलवार से सैकड़ों असुरों को एक ही झटके में मौत के घाट उतार दिया। कुछ राक्षस देवी के घण्टे की आवाज से मोहित हो गये देवी ने झट से उन्हें अपने पास में बांध कर पृथ्वी पर घसीट कर मार डाला। देवी की चण्डी ने असुर सेना का इस प्रकार संहार कर दिया मानों तिनके और लकड़ी के ढेर में आग लगा दी हो। इस युद्ध में महिषासुर का वध तो हो ही गया साथ में अनेक अन्य नामी ग्रामी दैत्य और राक्षस भी मारे जिन्होंने तीनों लोकों में आतंक फैला रखा था। सभी देवी देवताओं ने प्रसन्न होकर आकाश से फूलों की वर्षा की। देवी का वाहन शेर भी भयंकर आवाज करता हुआ अपने बालों को हिलाता हुआ झूम रहा था। इस प्रकार सबसे पहले देवी ने देव दानव युद्ध में महिषासुर और अन्य दैत्यों से देवताओं को अभयदान दिलाया। चन्द्रघण्टा की पूजा अर्चना देवी के मण्डपों में बड़े उत्साह और उमंग से की जाती है। इसके स्वरूप के उत्पन्न होने से दानवों का अन्त होना आरंभ हो गया था। मंडपों में सजे हुए घण्ट और घड़ियाल बजार चन्द्रघण्टा की पूजा उस समय की जाती है जब आकाश में एक लकीरनुमा चन्द्रमा सांयकाल के समय उदित हो रहा हो। इसकी पूजा अर्चना करने से न केवल बल और बुद्धि का विकास होता है बल्कि युक्ति शक्ति और प्रकृति भी साधक का साथ देती है। उसकी पूजा अर्चना के बाद जगदम्बा माता की आरती की जाती है। 


चौथा दिन कूष्माण्डा नामक दुर्गा के लिए :   




 माता दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। अपनी मन्द हल्की हंसी द्वारा ब्रहमाण्ड को उत्पन्न करने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा पड़ा। नवरात्रों में चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन '' अनाहज '' चक्र में स्थित होता है। अतः पवित्र मन से पूजा उपासना के कार्य में लगाना चाहिए। मां की उपासना मनुष्य को स्वभाविक रूप से भवसागर से पार उतरने के लिए सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है। माता कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधिव्याधियों से विमुक्त करके उसे सुख समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाती है। अतः अपनी लौकिक पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को कूष्माण्डा की उपासना में हमेशा तत्पर रहना चाहिए। 


सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च। 

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तुमे।। 


चौथी दुर्गा कूष्मांडा त्रिविध तापयुक्त संसार में कुत्सित ऊष्मा को हरने वाली देवी के उदर में पिण्ड और ब्रहमाण्ड के समस्त जठर और अग्नि का स्वरूप समाहित है। कूष्माण्डा देवी ही ब्रहमाण्ड से पिण्ड को उत्पन्न करने वाली दुर्गा कहलाती है। दुर्गा माता का यह चौथा स्वरूप है। इसलिए नवरात्रि में चतुर्थी तिथि को इनकी पूजा होती है। लौकिक स्वरूप में यह बाघ की सवारी करती हुई अष्टभुजाधारी मस्तक पर रत्नजटित स्वर्ण मुकुट वाली एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में कलश लिए हुए उज्जवल स्वरूप की दुर्गा है। इसके अन्य हाथों में कमल सुदर्शन चक्र गदा धनुष बाण और अक्ष माला विराजमान है। इन सब उपकरणों को धारण करने वाली कूष्माण्डा अपने भक्तों को रोग शोक और विनाश से मुक्त करके आयु यश बल और बुद्धि प्रदान करती है। सप्तशती के चौथे अध्याय में महिषासुर के अन्त के बाद देवताओं द्वारा देवी की स्तुति का वर्णन है। स्वर्ग में जहां देवताओं ने अपने गायन नृत्य और स्तुति से अम्बिका का गुणगान किया वहां धरती पर ऋषि मुनियों ने दुर्गा के स्तुति में होम यज्ञ और पाठ करने शुरू कर दिये। दुर्गा के बीज मंत्र ओम् एं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे से लाखों बार होम करके दुर्गा माता का इसी तरह से स्वर्ग लोक में देवताओं ने कूष्माण्डा का आवाहन किया। 


ओम् जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। 

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽतु ते।। 

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। 

जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽतु ते।। 

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः। 

रूपं देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषो जहि।। 

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः। 

रूपां देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। 

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। 

रूपं देहि जयं देहि यशों देहि द्विषो।। 

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। 

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। 

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। 

तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोभ्दवाम्।। 


कूष्माण्डा के रूप में देवी की स्तुति करते हुए ब्रहमा जी ने कहा कि हे देवी तुम्ही स्वाहा हो तुम्ही वषट्कार हो। स्वर भी मुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्ही जीवनदायिनी सुधा हो। नितय अक्षर प्रणव में अकार उकार मकार -- इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थिति हो तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है , जिसका विशेष रूप से उच्चरण नहीं किया जा सकता वह भी तुम्ही हो। देवि ! तुम्हीं संध्या सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रहमाण्ड को धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्त में सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवी इस जगत की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो पालन काल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्तर के समय संहाररूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृति महामोहरूपा महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री तुम्हीं ईश्वरी तुम्हीं और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा पुष्टि तुष्टि शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खडगधारिणी शूलधारिणी घेररूपा तथा गदा चक्र शंख और धनुष धारण करने वाली हो। बाण भुशुण्डी और परिघ-ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो इतना ही नहीं जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर--सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत् रूप जो कुछ वस्तुएं हैं और उन सबकी जो शक्ति है वह तुम्हीं हो। 


पांचवां दिन स्कन्दमाता नामक दुर्गा के लिए : 



   मां दुर्गा के पांचवे स्वरूप को स्कन्दमाता कहा जाता है। ये भगवान स्कन्द '' कुमार कार्तिकेय '' के नाम से भी जाने जाते हैं। इन्हीं भगवान स्कन्द अर्थात कार्तिकेय की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। इनकी उपासना नवरात्रि पूजा के पांचवें दिन की जाती है। इस दिन साधक का मन '' विशुद्ध '' चक्र में स्थित रहता है। इनका वर्ण शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान हैं। इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। नवरात्र पूजन के पांचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित रहने वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाएं एवं चित्त वृत्तियों का लोप हो जाता है। 

सिंहासानगता नितयं पद्माश्रितकरद्वया। 

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।। 


पांचवीं दुर्गा स्कन्दमाता श्रुति और समृद्धि से युक्त छान्दोग्य उपनिषद के प्रवर्तक सनत्कुमार की माता भगवती का नाम स्कन्द है। अतः उनकी माता होने से कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री देवी को पांचवीं दुर्गा स्कन्दमाता के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रि में इसकी पूजा अर्चना का विशेष विधान है। अपने सांसारिक स्वरूप में यह देवी सिंह की सवारी पर विराजमान है। तथा चतुर्भज इस दुर्गा का स्वरूप दोनों हाथों में कमलदल लिये हुए और एक हाथ से अपनी गोद में ब्रहमस्वरूप सनत्कुमार को थामे हुए है। यह दुर्गा समस्त ज्ञान विज्ञान धर्म कर्म और कृषि उद्योग सहित पंच आवरणों से समाहित विद्यावाहिनी दुर्गा भी कहलाती है। चौथे और पांचवे अध्याय में जब समस्त देवतागण और महेश जी महिषासुर के वध के उपरान्त पूजनीय जगदम्बा को भक्तिपूर्वक नमस्कार करने गये तो देवी भगवती के अद्वितीय आभामंडल को देखकर चकित रह गये। सभी देवताओं ने सिर झुकाकर भगवती दुर्गा को नमस्कार करते हुए कहा कि........ 

श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा। 

तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्।।

 किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत् किं चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि। 

किं चाहवेषु चरितानि तवाभ्वदुतानि सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु।।

 हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै-र्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा। सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत- मत्याकृता हि पमर प्रकृतिस्त्वमाद्या। यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन तृप्तिं प्रयात्ति सकलेषु मखेषु देवि। स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु- रूच्चार्यसे त्वमत एवं जनैः स्वधा च।। 


देवताओं के मुख से पंचम देवी स्कन्दमाता के अभिप्राय में उपरोक्त श्लोकों का भावार्थ इस प्रकार से होगा - हे देवि ! आपके इस अचिन्त्य रूप का.... असुरों का नाश करने वाले भारी पराक्रम का , तथा समस्त देवताओं और दैत्यों के समक्ष युद्ध में प्रकट किये हुए आपके अदभुत चरित्रों का हम किस प्रकार से वर्णन करें। आप सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति में कारण हैं आप में सत्वगुण रजोगुण और तमोगुण ये तीनों गुण मौजूद हैं तो भी दोषों के साथ आपका संसर्ग नहीं जान पड़ता। भगवान विष्णु और महादेवजी आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते। आप ही सबका आश्रय हैं। यह समस्त जगत आपका अंशभूत है क्योंकि आप सबकी आदिभूत अव्याकृता परा प्रकृति हैं। देवि ! सम्पूर्ण यज्ञों में जिसके उच्चारण से सब देता तृप्ति लाभ करते हैं वह स्वाहा आप ही हैं। इसके अतिरिक्त आप पितरों की भी तृप्तिका कारण हैं अतएव सब लोग आपको स्वधा भी कहते हैं। देवि ! जो मोक्ष की प्राप्ति का साधन है अचिन्त्य महाव्रतस्वरूपा है समस्त दोषों से रहित जितेन्द्रिय तत्व को ही सार वस्तु मानने वाले तथा मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले मुनिजन जिसका अभ्यास करते हैं वह भगवती परा विद्या आप ही हैं आप शब्दस्वरूपा हैं अत्यन्त निर्मल ऋग्वेद यजुर्वेद तथा उद्गीथ के मनोहर पदों के पाठ से युक्त सामवेद का भी आधार आप ही हैं। आप देवी त्रयी (तीनों वेद)और भगवती (छहों ऐश्वर्यो से युक्त)हैं। इस विश्व की उत्पत्ति एवं पालन के लिये आप ही वार्ता (खेती एवं आजीविका) के रूप में प्रकट हुई हैं। आप सम्पूर्ण जगत की घोर पीड़ा का नाश करने वाली हैं। देवि ! जिससे समस्त शास्त्रों के सार का ज्ञान होता है वह मेधाशक्ति आप ही हैं। दुर्गम भवसागर से पार उतारने वाली नौकारूप दुर्गादेवी भी आप ही हैं। आपकी कहीं भी आसक्ति नहीं है। कैटभ के शत्रु भगवान विष्णु के वक्ष5स्थल में एकामात्र निवास करने वाली भगवती लक्ष्मी तथा भगवान चन्द्रशेखर द्वारा सम्मानित गौरी देवी भी आप ही हैं। आपका मुख मन्द मुस्कान से सुशोभितनिर्मल पूर्ण चन्द्रमा के बिम्ब का अनुकरण करने वाला और उत्तम सुवर्ण की मनोहर कान्ति से कमनीय है तो भी उसे देखकर महिषासुर को क्रोध हुआ और सहसा उसने उस पर प्रहार कर दिया यह बड़े आश्चर्य की बात है। देवि ! वही मुख जब क्रोध से युक्त होने पर उदयकाल के चन्द्रमा की भांति लाल और तनी हुई भौंहो के कारण विकराल हो उठा तब उसे देखकर जो महिषासुर के प्राण तुरन्त नहीं निकल गये यह उससे भी बढ़कर आश्चर्य की बात है क्योंकि क्रोध में भरे हुए यमराज को देखकर भला कौन जीवित रह सकता है ? देवि ! आप प्रसन्न हों परमात्मस्वरूपा आपके प्रसन्न होने पर जगत का अभ्युदय होता है और क्रोध भर जाने पर आप तत्काल ही कितने कुलों का सर्वनाश कर डालती हैं यह बात अभी अनुभव में आयी है क्योंकि महिषासुर की यह विशाल सेना क्षणभर में आपके कोप से नष्ट हो गयी है। 


पंचम देवी स्कन्द माता की पूजा अर्चना भी देवी के मण्डपों में ठीक वैसे ही होती है जैसे कि अन्य देवियों की। स्कन्द माता की गोद में उन्हीं का सूक्ष्म रूप छः सिरों वाली देवि का है। अतः इनकी पूजा अर्चना में छोटे छोटे छः मिट्टी की मूर्तियां सजानी बडी जरूरी हैं। इनके दोनों हाथों में कमल और सूक्ष्म रूपी स्कन्द माता के शरीर में धनुष बाण की आकृति है। पूजा के दौरान धनुष बाण का अर्पण करना भी शुभ रहता है। स्कन्दमाता के मन्दिर यत्रतत्र बने हुए हैं और श्रद्धालुजन उन्हें कन्दमूल फल आदि अर्पित करके अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। 


छठा दिन कात्यायनी नामक दुर्गा के लिए : 



  मां दुर्गा के छठे स्वरूप को कात्यायनी कहते हैं। कात्यायनी महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थी। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की थी, इसीलिए ये कात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध हुईं । मां कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं। दुर्गा पूजा के छठे दिन इनके स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन साधक का मन '' आज्ञा चक्र '' में स्थित रहता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यन्त ही महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक मां कात्यायनी के चरणों में अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है। भक्त को सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं इनका साधक इस लोक में रहते हुए भी अलौकिक तेज से युक्त रहता है। 

चन्द्रहासोज्जवलकरा शाईलवरवाहना। 

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।। 


छठी दुर्गा कात्यायनी यह दुर्गा देवताओं के और ऋषियों के कार्यो को सिद्ध करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुई महर्षि ने उन्हें अपनी कन्या के स्वरूप पालन पोषण किया साक्षात दुर्गा स्वरूप इस छठी देवी का नाम कात्यायनी पड़ गया। यह दानवों और असुरों तथा पापी जीवधारियों का नाश करने वाली देवी भी कहलाती है। वैदिक युग में यह ऋषिमुनियों को कष्ट देने वाले प्राणघातक दानवों को अपने तेज से ही नष्ट कर देती थी। सांसारिक स्वरूप में यह शेर यानि सिंह पर सवार चार भुजाओं वाली सुसज्जित आभा मंडल युक्त देवी कहलाती है। इसके बायें हाथ में कमल और तलवार दाहिने हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा अंकित है। महिषासुर के बाद शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों ने अपने असुरी बल के घमण्ड में आकर इन्द्र के तीनों लोकों का राज्य और धनकोष छीन लिया। शुम्भ और निशुम्भ नामक राक्षस ही नवग्रहों को बन्धक बनाकर इनके अधिकार का उपयोग करने लगे। वायु और अग्नि का कार्य भी वही करने लगे। उन दोनों ने सभी देवताओं को अपमानित कर राज्य भ्रष्ट घोषित कर पराजित तथा अधिकार हीन बनाकर स्वर्ग से निकाल दिया। उन दोनों महान असुरों से तिरस्कृत देवताओं ने अपराजिता देवी का स्मरण किया। कि हे जगदम्बा आपने हम लोगों को वरदान दिया था कि आपत्ति काल में आपको स्मरण करने पर आप हमारे सभी कष्टों का तत्काल नाश कर देंगी। यह प्रार्थना लेकर देवता हिमालय पर्वत पर गये और वहां जाकर विष्णुमाया नामक दुर्गा की स्तुति करने लगे। 

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। 

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।। 

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्रयै नमो नमः। 

ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमो नमः।। 

कल्याण्यै प्रणतां वृद्धयै सिद्धयै कुर्मो नमो नमः। 

नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः।। 

दुर्गार्य दुर्गपारार्य सारार्य सर्वकारिण्यै। 

ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रार्य सततं नमः।। 

अतिसौम्यातिरौद्रार्य नतास्तस्यै नमो नमः। 

नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्याभिधीयते। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।।। 

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता:। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिताः। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु क्षानितरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।।। 

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु कानितरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।।। 

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः।। 


जब शुम्भ और निशुम्भ ने सम्पूर्ण पृथ्वी लोक पाताल लोक और स्वर्ग लोक को अपने कब्जे में लेकर सम्पूर्ण देवताओं के धन और सम्पत्ति को राक्षस साम्राज्य के हवाले कर दिया और फिर अम्बिका नामक दुर्गा से कहने लगे तुम भी आकर हमारी गुलामी करो। इस पद देवी माता ने कहा कि शुम्भ और निशुम्भ में जो मुझे हरा देगा मैं उसी की दासी बन जाऊंगी और अन्त में जब घोर युद्ध हुआ तो दोनों राक्षस मारे गये। कात्यायनी देवी ने तब तीनों लोकों को शुम्भ और निशुम्भ के राक्षस साम्राज्य से मुक्त कराकर देवताओं को महान प्रसन्नता से आर्विभूत कराया। देवी के मण्डपों में छटे दिन कात्यायनी की पूजा अर्चना भी बड़े धूमधाम से की जायेगी। सातवां दिन कालरात्रि नामक दुर्गा के लिए मां दुर्गा के सातवें स्वरूप को कालरात्रि कहा जाता है। मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है , लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली मानी जाती है। इसलिए इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है। दुर्गा पूजा के सप्तम् दिन मां कालरात्रि की पूजा का विधान है। इस दिन साधक का मन '' सहस्रार '' चक्र में स्थित रहता है। उसके लिए ब्रहमाण्ड की समस्त सिद्धियों के द्वार खुलने लगते हैं। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः मां कालरात्रि के रूपरूप में अवस्थित रहता है। मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश और ग्रह बाधाओं को दूर करने वाली हैं। जिससे साधक भयमुक्त हो जाता है। 

एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। 

लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।। वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा। 

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।। 


सातवीं दुर्गा कालरात्रि :    




अपने महा विनाशक गुणों से शत्रु एवं दुष्ट लोगों का संहार करने वाली सातवीं दुर्गा का नाम कालरात्रि है। विनाशिका होने के कारण इसका नाम कालरात्रि पड़ गया। इसे काली भी कहा जाता है। आकृति और सांसारिक स्वरूप में यह कालिका का अवतार यानि काले रंग रूप की अपनी विशाल केश राशि को फैलाकर चार भुजाओं वाली दुर्गा है। जो वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की ताण्डव मुद्रा में नजर आती है। इसकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है। एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकड़कर दूसरे हाथ में खड़क तलवार से युद्ध स्थल में उनका नाश करने वाली कालरात्रि सचमुच ही अपने विकट रूप में नजर आती है। इसकी सवारी गधर्व यानि गधा है जो समस्त जीवजन्तुओं में सबसे अधिक परिश्रमी और निर्भय होकर अपनी अधिष्ठात्री देवी कालरात्रि को लेकर इस संसार में विचरण कर रहा है। कालरात्रि की पूजा नवरात्र के सातवें दिन की जाती है। इसे कराली भयंकरी कृष्णा और काली माता का स्वरूप भी प्रदान है लेकिन भक्तों पर उनकी असीम कृपा रहती है और उन्हें वह हर तरफ से रक्षा ही प्रदान करती है। अपने भाई निशुम्भ के मारे जाने और रक्तबीज के मारे जाने के बाद दैत्यराज शुम्भ ने देवी अम्बिका को युद्ध के लिए ललकारा बाणों की वर्षा तथा तीखे शस्त्रों तथा दारूण अस्त्रों के प्रहार के कारण उन दोनों का युद्ध सब लोगों के लिए भयानक प्रतीत हुआ। उस समय अम्बिका देवी ने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोडे उन्हें दैत्यराज शुम्भ ने उनके निवारक अस्त्रों द्वारा काट डाला। इसी प्रकार शुम्भ ने भी जो दिव्य अस्त्र चलाये उन्हें परमेश्वरी ने भयंकर हुंकार शब्द के उच्चारण आदि द्वारा खिलवाड़ में ही नष्ट कर डाला। तब उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को आच्छादित कर दिया। यह देख क्रोध में भरी हुई उन देवी ने भी बाण मारकर उसका धनुष काट डाला। धनुष कट जाने पर फिर दैत्यराज ने शक्ति हाथ में ली किन्तु देवी ने चक्र से उसके हाथ की शक्ति को भी काट गिराया। तत्पश्चात दैत्यों के स्वामी शुम्भ ने सौ चांदवाली चमकती हुई ढाल और तलवार हाथ में ले उस समय देवी पर धावा किया। उसके आते ही चण्डिका ने अपने धनुष से छोड़े हुए तीखे बाणों द्वारा उसकी सूर्यकिरणों के समान उज्जव ढाल और तलवार तुरन्त काट दिया। फिर उस दैत्य के घोडेऔर सारथि मारे गये धनुष तो पहले ही कट चुका था। अब उसने अम्बिका को मारने के लिये उद्यत हो भयंकर मुदगर हाथ में ले लिया। उसे आते देख देवी ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसका मुदगर भी काट डाला। तिस पर भी वह असुर मुक्का तानकर बडे वेग से देवी की ओर झपटा। उस दैत्यराज ने देवी की छाती में मुक्का मारा तब उन देवी ने भी उसकी छाती में एक चांटा जड़ दिया। देवी का थप्पड़ खाकर दैत्यराज शुम्भ पृथ्वी पर गिर पडा किन्तु पुनः सहसा पूर्ववत उठकर खडा हो गया। फिर वह उछला और देवी को ऊपर ले जाकर आकाश में खडा हो गया तब चण्डिका आकश में भह बिना किसी आधार के ही शुम्भ के साथ युद्ध करने लगीं। उस समय दैत्य और चण्डिका आकाश में एक दूसरे से लड़ने लगे। उनका वह युद्ध पहले सिद्ध और मुनियों को विस्मय में डालने वाला हुआ। फिर अम्बिका ने शुम्भ के साथ बहुत देर तक युद्ध करने के पश्चात उसे उठाकर घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया। पटके जाने पर पृथ्वी पर आने के बाद वह दुष्टात्मा दैत्य पुनः चण्डिका का वध करने के लिये उनकी ओर बडे वेग से दौडा। तब समस्त दैत्यों के राजा शुम्भ को अपनी ओर आते देख देवी ने त्रिशूलसे उसकी छाती छेदकर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। देवी के शूल की धार से घायल होने पर उसके प्राण पखेरू उड़ गये और वह समुद्रों द्वीपों तथा पर्वतों सहित समूची पृथ्वी को कंपाता हुआ भूमि पर गिर पड़ा तदनन्तर उस दुरात्मा के मारे जाने पर सम्पूर्ण जगत प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया तथा आकाश स्वच्छ दिखायी देने लगा। पहले जो उत्पातसूचक मेघ और उल्कापात होते थे वे सब शान्त हो गये तथा उस दैत्य के मारे जाने पर नदियां भी ठीक मार्ग से बहने लगीं। उस समय शुम्भ की मृत्यु के बाद सम्पूर्ण देवताओं का हृदय हर्ष से भर गया और गन्धर्वगण मधुर गीत गाने लगे। दूसरे गन्धर्व बाजे बजाने लगे और अप्सराएं नाचने लगी। पवित्र वायु बहने लगी। सूर्य की प्रभा उत्तम हो गयी। अग्निशाला की बुझी हुई आग अपने आप प्रज्वलित हो उठी तथा सम्पूर्ण दिशाओं के भयंकर शब्द शान्त हो गये। सातवीं देवी कालरात्रि तीन नेत्रों वाली दुर्गा के रूप में मशहूर है। उनके श्री अंगों की प्रभा बिजली के समान है। वे सिंह के कंधे पर बैठी हुई भयंकर प्रतीत होती हैं। हाथों में तलवार और ढाल लिये हुए अनेक कन्यायें उनकी सेवा में खडी हुई हैं। वे अपने हाथ में चक्र गदा तलवार ढाल बाण धनुष पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किय हुए उनका स्वरूप अग्निमय है तथा वे माथे पर चन्द्रमा का मुकुट धारती करती हैं। कालरात्रि देवी ने कहा कि जो व्यक्ति मण्डप में जो रोज नवरात्रों के व्रत लेकर नव दुर्गाओं की पूजा करेगा। एकाग्रचित्त होकर मेरा ध्यान करेगा। उसकी मैं निश्चय ही सभी बाधायें व संकट दूर करूंगी। जो मधुकैटभ का नाश महिषासुर का वध तथा शुम्भ निशुम्भ के संहार के प्रसंग का पाठा करेंगे तथा अष्टमी चतुर्दशी और नवमी को भी जो एकाग्रचित हो भक्तिपूर्वक मेरे उत्तम महातम्यका श्रवण करेंगे। उन्हें कोई पाप नहीं छू सकेगा। उपर पर पापजनित आपत्तियां भी नहीं आयेंगी। उनके घर में कभी दरिद्रता नहीं होगी तथा उनको कभी प्रेमीजनों के विछोह का कष्ट भी नहीं भोगना पड़ेगा। इतना ही नहीं उन्हें शत्रु से लुटेरों से राजा से शस्त्र से अग्नि से तथा जल की राशि से भी कभी भय नहीं होगा। इसलिये सबको एकाग्रचित होकर भक्तिपूर्वक मेरे इस माहात्म्य को सदा पढ़ना और सुनना चाहिए। यह परमकल्याणकारक है। 

आठवां दिन महागौरी नामक दुर्गा के लिए :   


 


मां दुर्गा के आठवें स्वरूप का नाम महागौरी है। दुर्गा पूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी कलुष धुल जाते हैं। 

श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः। 

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।। 

आठवीं दुर्गा महागौरी नवरात्र के आठवें दिन आठवीं दुर्गा महागौरी की पूजा अर्चना और स्थापना की जाती है। अपनी तपस्या के द्वारा इन्होंने गौर वर्ण प्राप्त किया था। अतः इन्हें उज्जवल स्वरूप की महागौरी धन ऐश्वर्य पदायिनी चैतन्यमयी त्रैलोक्य पुज्य मंगला शारिरिक मानसिक और सांसारिक ताप का हरण करने वाली माता महागौरी का नाम दिया गया है। उत्पत्ति के समय यह आठ वर्ष की आयु की होने के कारण नवरात्र के आठवें दिन पूजने से सदा सुख और शान्ति देती है। अपने भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप है। इसीलिए इसके भक्त अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन और सम्मान करते हुए महागौरी की कृपा प्राप्त करते हैं। यह धन वैभव और सुख शान्ति की अधिष्ठात्री देवी है। सांसारिक रूप में इसका स्वरूप बहुत ही उज्जवल कोमल स्वेतवर्णा तथा स्वेत वस्त्रधारी चतुर्भुज युक्त एक हाथ में त्रिशूल दूसरे हाथ में डमरू लिये हुए गायन संगीत की प्रिय देवी है जो सफेद वृषभ यानि बैल पर सवार है। नवरात्र के दौरान आठवीं देवी महागौरी की पूजा अर्चना का विधान है इसी दिन प्रातःकाल के समय अन्नकूट पूजा यानि कन्या पूजन का भी विधान है। कुछ लोग नवमी के दिन भी कन्या पूजन करते हैं लेकिन अष्ठमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ रहता है। कन्याओं की संख्या 9 हो तो अति उत्तम है नहीं तो दो कन्याओं से भी काम चल सकता है। कन्याओं की आयु 2 वर्ष से ऊपर तथा 10 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। दो वर्ष की कन्या कुमारी तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति चार वर्ष की कन्या कल्याणी पांच वर्ष की कन्या रोहिणी छः वर्ष की कन्या कालिका सात वर्ष की चण्डिका आठ वर्ष की कन्या शाम्भवी नौ वर्ष की कन्या दुर्गा तथा दस वर्ष की कन्या सुभद्रा मानी जाती है। इनको नमस्कार करने के मंत्र निम्नलिखित हैं --1. कौमाटर्यै नमः 2. त्रिमूर्त्यै नमः 3. कल्याण्यै नमः 4. रोहिर्ण्य नमः 5. कालिकायै नमः 6. चण्डिकार्य नमः 7. शम्भव्यै नमः 8. दुर्गायै नमः 9. सुभद्रायै नमः। कुमारी कन्याओं में नगी अधिकांगी या कुरूपा नहीं होनी चाहिए। भोजन करने के बाद उन कन्याओं को दक्षिणा देनी चाहिए। इस प्रकार महामाया भगवती प्रसन्नता से हामारे मनोरथ पूर्ण करती हैं। आठवीं देवी महागौरी पार्वती ने इस भूलोक में ऋद्धि सिद्धि प्राप्त करने के लिए एक महाकुंजीका स्तोत्र की रचना की और जिसका मंत्र निम्नलिखित है। इस मंत्र को जो नित्य ही देवी दुर्गा का ध्यान करके पढेगा। उसको इस संसार में धनधान्य समृद्धि और सुख शांति के अलावा सभी प्रकार के निर्भय जीवन व्यतीत करने के सुख साधन मिलेंगे। यह एक गुप्त मंत्र है कि इसके पाठ के द्वारा ही मारण मोहन वशीकरण स्तम्भन और उच्चाटन आदि के उद्देश्यों की भी पूर्ति करता है। मूल मंत्र नीचे दिया जा रहा है। 

ओम् ऐं ह्रीं क्लीं चमुण्डायै विच्चे।। 

ओम् ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।। 

नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि। 

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि।। 

नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनि।। 

जागतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व में। 

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।। 

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽतु ते। 

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। 

विच्चे चाभ्यदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि।।

 धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। 

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरू।। 

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी। 

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः।। 

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजागं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरू कुरू स्वाहा।। 

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।। 

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरूष्व में।। 

इदं तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्। 

न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा।। 

देवी के अष्टम स्वरूप महागौरी की पूजा अर्चना के समय रात्रिकाल में शिव और पार्वती सहित गणेश आदि की पूजा करनी भी आवश्यक है। देवी के पाठ में अनेक प्रकार स्तोत्र श्लोक एवं स्तुति गान के पाठ की व्यवस्था मार्कण्डेय पुराण सहित दुर्गासप्तशती में दी गई है। दुर्गा की पूजा में बैठने के लिए उनकी मूर्ति या चित्र को अपने आसन से अधिक ऊंचे आसन में रखना जरूरी है। देवी के स्तोत्र के पूजा करने के उपरान्त उनसे अपराध क्षमा याचना का स्तोत्र भी पढना अनिवार्य है। यह स्तोत्र इस प्रकार से है-- न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न च आहवानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। 

न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेयशहरणम्।। 

विधेरज्ञानेन द्रवणिविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। 

तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।। 

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सनित सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः। 

मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।। 


इस प्रकार श्लोक के अभिप्राय के अनुसार देवी माता से अपने किये गये दैहिक दैविक या भौतिक अपराध की क्षमा याचना नित्य ही करनी चाहिए। 

नौवां दिन सिद्धिदात्री नामक दुर्गा के लिए :  


 


 मां दुर्गा की नवीं शक्ति को सिद्धिदात्री कहते हैं। जैसा नाम से प्रकट है ये सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। नव-दुर्गाओं में मां सिद्धिदात्री अन्तिम हैं। इनकी उपासना के बाद भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। देवी के लिए बनाए नैवेद्य की थाली में भोग का समान रखकर निम्न रूप से प्रार्थना करनी चाहिए। सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।। भोग समर्पण के पश्चात दुर्गा चालीसा , विन्ध्येश्वरी चालीसा , विन्ध्येश्वरी स्तोत्र का पाठ करके श्री दुर्गाजी की आरती करके नवरात्रों को हाथ जोड़कर विदा किया जाता है व्रत रखने वाले नर-नारी इस प्रकार से पूजा समाप्त करके भोजन करें और सामान्य व्यवहार व्यापार प्रारम्भ करें। नवीं दुर्गा सिद्धिदात्री नवदुर्गाओं में सबसे श्रेष्ठ और सिद्धि और मोक्ष देने वाली दुर्गा को सिद्धिदात्री कहा जाता है। यह देवी भगवान विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मी के समान कमल के आसन पर विराजमान है। और हाथों में कमल शंख गदा सुदर्शन चक्र धारण किये हुए है। देव यक्ष किन्नर दानव ऋषि मुनि साधक विप्र और संसारी जन सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्र के नवें दिन करके अपनी जीवन में यश बल और धन की प्राप्ति करते हैं। सिद्धिदात्री देवी उन सभी महाविद्याओं की अष्ट सिद्धियां भी प्रदान करती हैं जो सच्चे हृदय से उनके लिये आराधना करता है। नवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा उपासना करने के लिए नवाहन का प्रसाद और नवरस युक्त भोजन तथा नौ प्रकार के फल फूल आदि का अर्पण करके जो भक्त नवरात्र का समापन करते हैं उनको इस संसार में धर्म अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप है। जो स्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महा ज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती है। नवें दिन सभी नवदुर्गाओं के सांसारिक स्वरूप को विसर्जन की परम्परा भी गंगा नर्मदा कावेरी या समुद्र जल में विसर्जित करने की परम्परा भी है। नवदुर्गा के स्वरूप में साक्षात पार्वती और भगवती विघ्नविनाशक गणपति को भी सम्मानित किया जाता है। वैसे तो दुर्गा के कई नाम हैं लेकिन नवदुर्गा के 108 नामों की चर्चा हर जगह आती है। इन 108 नामों में वह दुर्गायें भी हैं जो देवासुर संग्राम में खत्म हो गई। इन सभी 108 दुर्गाओं में से कुछ प्रमुख का यहां पर उल्लेख किया जा रहा है। 

शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने। 

यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती।। 

ओम् सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी। 

आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी।। 

पिनाकधाधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः। 

मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः।। 

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी। 

अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः।। 

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा। 

सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी।। 

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती। 

पट्टाम्बरपरीधाना कलमण्जीररंजिनी।। 

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी। 

वनदुर्गा च मातंगी मतंमुनिपूजिता।। 

ब्राहमी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा। 

चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरूषाकृतिः।। 

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा। 

बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना।।

 निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी। 

मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी।। 

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी। 

सर्वशास्त्रमयी सतया सर्वास्त्रधारिणी तथा।। 

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी। 

कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः।। 

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा। 

महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला।। 

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी। 

नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी।। 

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी। 

कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रहमवादिनी।। 

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्। 

नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति।। 

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च। 

चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्।। 


अन्त में सिद्धिदात्री के पीछे यही प्रार्थना है कि मैं हमेशा ही आपके ध्यान में तल्लीन रहूं। मुझे न मोक्ष की अभिलाषा है , न सम्पूर्ण वैभव की इच्छा है , न मुझे ज्ञान की आकांक्षा है। आपकी सेवा करता रहूं , मेरी यही इच्छा है। हे माता ! मैं आपसे विनती करता हूं कि जनम-जन्मान्तरतक आपके चरणों की सेवा में लिप्त रहूं। हे शिवानी ! आप यदि किंचित मात्र भी मुझ अनाथ पर कृपा कर दो तो मेरा जनम सफल हो जाए। हे दुर्गे ! दयानिधे ! मैं भूख प्यास के समय भी आपका स्मरण करता रहूं। हे जगदम्बे ! इससे विचित्र और क्या बात हो सकती है कि आप अपनी कृपा से मुझे परिपूर्ण कर दो। अपराधी होते हुए भी हे माता ! मैं आपकी कृपा से वंचित न रह जाऊं , मेरी यही अभिलाषा है। हे महादेवी ! आप जो उचित समझें वैसा मेरे साथ व्यवहार करें। 


दशवें दिन- विजय दशमी अर्थात् अपराजिता पूजन : 


  

 दशहरे का असली नाम विजय दशमी है जिसे अपराजिता पूजा का पर्व भी कहते हैं। नवदुर्गाओं की माता अपराजिता सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड की शक्तिदायिनी और ऊर्जा उत्सर्जन करने वाली है। महर्षि वेद व्यास ने अपराजिता देवी को आदिकाल की श्रेष्ठ फल देने वाली.. देवताओं द्वारा पूजित महादेव , सहित ब्रहमा विष्णु और महेश के द्वारा नित्य ध्यान में लायी जाने वाली देवी कहा है। गायत्री स्वरूप अपराजिता को निम्नलिखित मंत्र से भी पूजा जाता है। 

ओम् महादेव्यै च विह्महे दुर्गायै धीमहि। 

तन्नो देवी प्रचोदयात्।। 

ओम् नमः सर्व हिताथौयै जगदाधार दायिके। 

साष्टांगोऽप्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः। 

नमस्ते देवी देवेशि नमस्ते ईप्सित प्रदे। 

नमस्ते जगतां धातित्र नमस्ते शंकरप्रिये।। 

ओम् सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत्। 

अतोऽहं विश्वरूपां तां नमामि परमेश्वरीम्।। 


देवी अपराजिता का पूजन का आरंभ तब से हुआ यह चारों युगों की शुरूआत हुई। देव दानव युद्ध का एक लम्बा अन्तराल बीत जाने पर नवदुर्गाओं ने जब दानवों के सम्पूर्ण वंश का नाश कर दिया तब दुर्गा माता अपनी आदि शक्ति अपराजिता को पूजने के लिए शमी की घास लेकर हिमालय में अन्तरध्यान हो गईं बाद में आर्य व्रत के राजाओं ने विजय पर्व के रूप में विजय दशमी की स्थापना की। ध्यान रहे कि उस वक्त की विजय दशमी देवताओं द्वारा दानवों पर विजय प्राप्त के उपलक्ष्य में थी। हालांकि उसमें इन्द्र आदि देवलोक के राजाओं के साथ धरती के राजा दशरथ जनक और शोणक ऋषि जैसे राजा भी थे जिन्होंने देव दानव युद्ध में अपना युद्ध कौशल दिखाया। स्वभाविक रूप से नवरात्र के दशवें दिन ही विजय दशमी मनाने की परम्परा चली। बाद में रामायण काल में राम ने अयोध्या का राज्याभिषेक किया लेकिन रावण एवं अन्य दानवों के पुनः जाग्रत होने से धरती फिर अशांत हो गई। अकेले राम ने अपने बाल्यकाल से ही आर्याव्रत पर घिरे हुए राक्षसों को एक - एक करके मारा। लेकिन सबसे बड़ा राक्षस रावण को मारने के लिए उन्हें जो जद्दोजहद करनी पड़ी उसका उल्लेख रामायण में मिलता है। नवरात्रों में ही सम्पूर्ण रामायण की रामलीला खेली जाती है। और दशवें दिन रावण का वध किया जाता है। दशानन रावण के वध से जो उत्सव भारत में मनाया गया वही उत्सव आज दशहरा यानि दस सिरों वाले रावण को हराने का प्रतीक है। अगर कहा जाये तो रामायण काल के बाद दशहरा मूलतः राजाओं यानि क्षत्रिय राजाओं का त्योहार रह गया है। जिस दिन वे विजयी होकर अपने राज्य पर उत्सव के रूप में जनसाधारण के बीच आते हैं। भारत में रामायण काल से ही अयोध्या के राजा राम के द्वारा मनाये जाने वाले विजय दशमी पर्व के अलावा क्षेत्रीय स्तर पर भी वहां के राजाओं की सवारी निकलती हैं। सारी सवारी रामलीला मैदान में एकत्रित होती हैं। और दस सिर वाले रावण, उसके भाई कुंभकर्ण, पुत्र मेघनाद को अग्नि प्रज्वलित करके जला देते हैं। कुल मिलाकर विजय दशमी बुराई पर अच्छाई की विजय का ही प्रतीक है। इस विजय के लिए देवी मां अपराजिता अपनी अपार शक्ति समय समय पर शूर वीर और क्षेत्रीय राजाओं को प्रदान करती रहती है। 

नवरात्री की  आप सभी को हार्दिक शुभकामना