ad

Wednesday, 18 November 2015

by OSHO...........मौत को धोखा

by OSHO...........मौत को धोखा


मैंने सुना है कि युनान में एक बहुत बडा मूर्तिकार हुआ । उस मूर्तिकार की बडी प्रशंसा थी सारे दूर-दूर के देशों तक । और लोग कहते थे कि अगर उसकी मूर्ति रखी हो बनी हुई और जिस आदमी की उसने मूर्ति बनाई है वह आदमी भी उसके पडोस में खडा हो जाए श्वास बदं करके, तो बताना मुश्किल है कि मूल कोन है और मूर्ति कोन है । दोनों एक से मालूम होने लगते हैं । 

उस मूर्तिकार की मौत करीब आई । तो उसने सोचा कि मौत को धोखा क्यों न दे दूँ ? उसने अपनी ही ग्यारह मूर्तिया बना कर तैयार कल लीं और उन ग्यारह मूर्तियों के साथ छिप कर खडा हो गया । मौत भीतर घुसी, उसने देखा, वहां बारह एक जैसे लोग हैं । वह बहुत मुश्किल में पड गई होगी?, एक को लेने आई थी, बारह लोग थे, किसको ले जाए ? और फिर कोन असली है ? वह वापस लौटी और उसने परमात्मा से कहा कि मैं बहुत मुश्किल में पड गई, वहां बारह एक जैसे लोग हैं ! असली को कैसे खोजूं ? 

परमात्मा ने उसके कान में एक सूत्र कहा । और कहा, इसे सदा याद रखना । जब भी असली को खोजना हो, इससे खोज लेना । यह तरकीब है असली को खोजने की । मौत वापस लोटी, उस कमरे के भीतर गई, उसने मूर्तियों को देखा और कहा मूर्तिया बहुत सुंदर बनी है, सिर्फ एक भूल रह गई । 

वह जो चित्रकार था वह बोला, कौन सी भूल? उस मृत्यु ने कहा, यही कि तुम अपने को नहीं भूल सकते । बाहर आ जाओ! और परमात्मा ने मुझे कहा कि जो अपने को नहीं भूल सकता उसे तो मरना ही पडेगा और जो अपने को भूल जाए उसे मारने का कोई उपाय नहीं, वह अमृत को उपलब्ध हो जाता है ।

Thursday, 12 November 2015

एक दिया ऐसा भी हो , जो भीतर तलक प्रकाश करे

दीपावली - एक दिया ऐसा हो




एक दिया ऐसा भी हो , जो 

भीतर तलक प्रकाश करे , 

एक दिया मुर्दा जीवन में , 

फिर आकर कुछ श्वास भरे | 


एक दिया सादा हो इतना , 

जैसे साधु का जीवन , 

एक दिया इतना सुन्दर हो , 

जैसे देवों का उपवन | 


एक दिया जो भेद मिटाए , 

क्या तेरा क्या मेरा है , 

एक दिया जो याद दिलाये , 

हर रात के बाद सवेरा है | 


एक दिया उनकी खातिर हो , 

जिनके घर में दिया नहीं , 

एक दिया उन बेचारों का , 

जिनको घर ही दिया नहीं | 


एक दिया सीमा के रक्षक , 

अपने वीर जवानों का , 

एक दिया मानवता-रक्षक , 

चंद बचे इंसानों का | 


एक दिया विश्वास दे उनको , 

जिनकी हिम्मत टूट गयी , 

एक दिया उस राह में भी हो , 

जो कल पीछे छूट गयी | 


एक दिया जो अंधकार का , 

जड़ के साथ विनाश करे , 

एक दिया ऐसा भी हो , जो 

भीतर तलक प्रकाश करे ||

हम सब दीपावली पर भगवन राम की पूजा क्यों नहीं करते?

हम सब दीपावली पर भगवन राम की पूजा क्यों नहीं करते? 


हम दीपावली का त्यौहार क्यूँ मनाते है?
इसका अधिकतर उत्तर मिलता है राम जी के वनवास से लौटने की ख़ुशी में।
सच है पर अधूरा।। अगर ऐसा ही है तो फिर हम सब दीपावली पर भगवन राम की पूजा क्यों नहीं करते? लक्ष्मी जी और गणेश भगवन की क्यों करते है?
सोच में पड़ गए न आप भी।
इसका उत्तर आप तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हूँ  


1. देवी लक्ष्मी जी का प्राकट्य:
देवी लक्ष्मी जी कार्तिक मॉस की अमावस्या के दिन समुन्दर मंथन में से अवतार लेकर प्रकट हुई थी।

2. भगवन विष्णु द्वारा लक्ष्मी जी को बचाना:
भगवन विष्णु ने आज ही के दिन अपने पांचवे अवतार वामन अवतार में देवी लक्ष्मी को राजा बालि से मुक्त करवाया था।

3. नरकासुर वध कृष्ण द्वारा:
इस दिन भगवन कृष्ण ने राक्षसों के राजा नरकासुर का वध कर उसके चंगुल से 16000 औरतों को मुक्त करवाया था। इसी ख़ुशी में दीपावली का त्यौहार दो दिन तक मनाया गया। इसे विजय पर्व के नाम से भी जाना जाता है।

4. पांडवो की वापसी:
महाभारत में लिखे अनुसार कार्तिक अमावस्या को पांडव अपना 12 साल का वनवास काट कर वापिस आये थे जो की उन्हें चौसर में कौरवो द्वारा हरये जाने के परिणाम स्वरूप मिला था। इस प्रकार उनके लौटने की खुशी में दीपावली मनाई गई।

5. राम जी की विजय पर :
रामायण के अनुसार ये चंद्रमा के कार्तिक मास की अमावस्या के नए दिन की शुरुआत थी जब भगवन राम माता सीता और लक्ष्मण जी अयोध्या वापिस लौटे थे रावण और उसकी लंका का दहन करके। अयोध्या के नागरिकों ने पुरे राज्य को इस प्रकार दीपमाला से प्रकाशित किया था जैसा आजतक कभी भी नहीं हुआ था।

6. विक्रमादित्य का राजतिलक:
आज ही के दिन भारत के महान राजा विक्रमदित्य का राज्याभिषेक हुआ था। इसी कारन दीपावली अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना भी है।

7. आर्य समाज के लिए प्रमुख दिन:
आज ही के दिन कार्तिक अमावस्या को एक महान व्यक्ति स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने हिंदुत्व का अस्तित्व बनाये रखने के लिए आर्य समाज की स्थापना की थी।

8. जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण दिन:
महावीर तीर्थंकर जी ने कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ही मोक्ष प्राप्त किया था।

9. सिक्खों के लिए महत्त्व:
तीसरे सिक्ख गुरु गुरु अमरदास जी ने लाल पत्र दिवस के रूप में मनाया था जिसमे सभी श्रद्धालु गुरु से आशीर्वाद लेने पहुंचे थे और 1577 में अमृतसर में हरिमंदिर साहिब का शिलान्यास किया गया था।
1619 में सिक्ख गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में 52 राजाओ के साथ मुक्त किया गया था जिन्हें मुगल बादशाह जहांगीर ने नजरबन्द किया हुआ था। इसे सिक्ख समाज बंदी छोड़ दिवस के रूप में भी जानते हैं।


10. द पोप का दीपावली पर भाषण:
1999 में पॉप जॉन पॉल 2 ने भारत में एक खास भाषण दिया था जिसमे चर्च को दीपावली के दीयों से सजाया गया था। पॉप के माथे पर तिलक लगाया गया था। और उन्होंने दीपावली के संदर्भ में रोंगटे खड़े कर देने वाली बाते बताई।
भगवान् गणेश सभी देवो में प्रथम पूजनीय है इसी कारण उनकी देवी लक्ष्मी जी के साथ दीपावली पर पूजा होती है और बाकी सभी कारणों के लिए हम दीपमाला लगाकर दीपावली का त्यौहार मनाते हैं।

टीपू सुल्तान एंटी हिंदू था या नहीं

टीपू सुल्तान एंटी हिंदू था या नहीं  



आईए, आपको बताते हैं इतिहास में दर्ज टीपू सुल्तान से जुड़ी  बातें  

1. 19वीं सदी में ब्रिटिश गवर्मेंट के अधिकारी और लेखक विलियम लोगान ने अपनी किताब 'मालाबार मैनुअल' में लिखा है कि कैसे टीपू सुल्तान ने अपने 30,000 सैनिकों के दल के साथ कालीकट में तबाही मचाई थी. टीपू सुल्तान हाथी पर सवार था और उसके पीछे उसकी विशाल सेना चल रही थी. पुरुषों और महिलाओं को सरेआम फांसी दी गई. उनके बच्चों को उन्हीं के गले में बांध पर लटकाया गया.

2. इसी किताब में विलियम यह भी लिखते हैं कि शहर के मंदिर और चर्चों को तोड़ने के आदेश दिए गए. यहीं नहीं, हिंदू और इसाई महिलाओं की शादी जबरन मुस्लिम युवकों से कराई गई. पुरुषों से मुस्लिम धर्म अपनाने को कहा गया और जिसने भी इससे इंकार किया उसे मार डालने का आदेश दिया गया.

3. कई जगहों पर उस पत्र का भी जिक्र मिलता है, जिसे टीपू सुल्तान ने सईद अब्दुल दुलाई और अपने एक अधिकारी जमान खान के नाम लिखा है. पत्र के अनुसार टीपू सुल्तान लिखता है, 'पैगंबर मोहम्मद और अल्लाह के करम से कालीकट के सभी हिंदूओं को मुसलमान बना दिया है. केवल कोचिन स्टेट के सीमवर्ती इलाकों के कुछ लोगों का धर्म परिवर्तन अभी नहीं कराया जा सका है. मैं जल्द ही इसमें भी कामयाबी हासिल कर लूंगा.'

4. यहां 1964 में प्रकाशित किताब 'लाइफ ऑफ टीपू सुल्तान' का जिक्र भी जरूरी है. इसमें लिखा गया है कि उसने तब मालाबार क्षेत्र में एक लाख से ज्यादा हिंदुओं और 70,000 से ज्यादा ईसाइयों को मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया.

5. इस किताब के अनुसार धर्म परिवर्तन टीपू सुल्तान का असल मकसद था, इसलिए उसने इसे बढ़ावा दिया. जिन लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया, उन्हें मजबूरी में अपने बच्चों की शिक्षा भी इस्लाम के अनुसार देनी पड़ी. इनमें से कई लोगों को बाद में टीपू सुल्तान की सेना में शामिल किया गया और अच्छे ओहदे दिए गए.

6. टीपू सुल्तान के ऐसे पत्रों का भी जिक्र मिलता है, जिसमें उसने फ्रेंच शासकों के साथ मिलकर अंग्रेजों को भगाने और फिर उनके साथ भारत के बंटवारे की बात की. ऐसा भी जिक्र मिलता है कि उसने तब अफगान शासक जमान शाह को भारत पर चढ़ाई करने का निमंत्रण दिया, ताकि यहां इस्लाम को और बढ़ावा मिल सके.

आइये जानिये मोदी की जन्मपत्री को............

आइये जानिये मोदी की जन्मपत्री को............ 





भारत के PM नरेन्द्र मोदी के सितारे इन दिनों कुछ अच्छे नहीं चल रहे हैं।

पहले दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल और अब बिहार विधानसभा चुनावों में लालू-नीतीश के हाथों हुई हार से उनके राजनीतिक विरोधी मुखर होकर उनकी आलोचना कर रहे हैं।

ज्योतिष की दृष्टि से देखा जाए तो उनकी कुंडली के अनुसार अभी उन्हें शनि की साढ़े साती लगी हुई है।

यह उन्हें 15 नवम्बर 2011 को शुरू हुई थी जो 23 जनवरी 2020 तक चलेगी। इसमें भी 3 नवम्बर 2014 को साढ़े साती अपने शिखर में पहुंच गई जो 26 अक्टूबर 2017 तक रहेगी। इसके बाद वह अपने अस्तकाल में आ जाएगी।

मोदी का जन्म 17 सितम्बर 1950 को गुजरात के बडऩगर में सुबह 10 बजे हुआ था। इस हिसाब से उनकी राशि तुला है। उनकी कुंडली के ग्यारहवें घर में शुक्र और शनि साथ बैठे हैं जिसके कारण ही वह भौतिक सुख-संपदा और उच्च आध्यात्मिक अनुभवों का एक साथ लाभ उठा पाते हैं।

शनि की साढे साती का है यह कमाल

इसके साथ ही उन्हें चन्द्रमा की महादशा और राहू की अन्र्तदशा चल रही है, जिसके कारण उन्हें राजनीति में स्थातित्व मिल रहा है। वर्ष 2014 के अंत में राहू और केतु की गोचर दशा नकारात्मक होने के कारण ही उन्हें दिल्ली तथा बिहार विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा। मोदी के नेतृत्व में विधानसभा चुनावों में आखिरी बार जीत जम्मू-कश्मीर में हुई। वहां भी नवंबर में चुनाव हुए जबकि शनि की साढ़े साती अपने शिखर चरण में प्रवेश कर रही थी, यही कारण रहा कि भाजपा को जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन कर सरकार बनानी पड़ी।

2017 तक हारेंगे हर चुनाव

इसके बाद फरवरी 2015 में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव तथा हाल ही के बिहार विधानसभा चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा। इस समय राहू 12वें घर में केतु तथा सूर्य से युति करेगा जिसके फलस्वरूप उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए जाएंगे।

साथ ही शनि गोचर में चन्द्रमा के साथ युति करेगा जिसके चलते भाजपा की अंदरूनी राजनीति में भी बहुत बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है। लोगों को कोई बड़ा आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि 2017 तक भाजपा किसी भी राज्य में कोई विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाए, हां वह मुख्य विपक्षी दल के रूप में जरूर उभरेगी।

दोस्तों के भेष में दुश्मन होंगे उनके साथ

इसके साथ ही मोदी के पुराने अच्छे साथी भी उनका साथ छोड़ देंगे। हाल ही में हम अरुण शौरी, राम जेठमलानी के रूप में इसकी हकीकत भी देख चुके हैं। हालांकि 9वें घर पर धर्म की दृष्टि होने से वह धार्मिक बने रहेंगे और निकट भविष्य में देश को और आगे ले जाएंगे।

सबसे बड़ी बात उनकी पार्टी के अंदरूनी साथी ही उनके दुश्मन बनेंगे और उन्हें डुबोने का काम कर रहे हैं। यदि भविष्य में मोदी पर किसी तरह का कोई संकट आता भी है तो इन ग्रह-नक्षत्रों के कारण उसके जिम्मेदार उनकी अपनी पार्टी के लोग होंगे जो गुप्त रूप से उनके खिलाफ अभियान चला रहे होंगे।

बना रहेगा उनके जीवन पर खतरा

बहुत संभव है कि वह इस दौरान किसी हादसे का शिकार भी हो जाएं। उनकी स्वास्थ्य के साथ साथ उनके जीवन के लिए भी लगातार खतरा बना रहेगा। अक्टूबर 2017 में उनकी साढ़े साती अपने अस्त चरण में प्रवेश कर जाएगी, तभी से उनकी मुश्किलें समाप्त होना शुरू हो जाएंगी और 2019 में साढ़े साती के हटते ही वह पूर्ण रूप से पूरी ताकत से फिर उभरेंगे।

Tuesday, 10 November 2015

धन तेरस

धन तेरस 


 उत्तरी भारत में कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस का पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास से मनाया जाता है. देव धनवन्तरी के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी जी और धन के देवता कुबेर के पूजन की परम्परा है. इस दिन कुबेर के अलावा यमदेव को भी दीपदान किया जाता है. इस दिन यमदेव की पूजा करने के विषय में एक मान्यता है कि इस दिन यमदेव की पूजा करने से घर में असमय मृ्त्यु का भय नहीं रहता है. धन त्रयोदशी के दिन यमदेव की पूजा करने के बाद घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख वाला दीपक पूरी रात्रि जलाना चाहिए. इस दीपक में कुछ पैसा व कौडी भी डाली जाती है. 

धनतेरस का महत्व 


साथ ही इस दिन नये उपहार, सिक्का, बर्तन व गहनों की खरीदारी करना शुभ रहता है. शुभ मुहूर्त समय में पूजन करने के साथ सात धान्यों की पूजा की जाती है. सात धान्य गेंहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर है. सात धान्यों के साथ ही पूजन सामग्री में विशेष रुप से स्वर्णपुष्पा के पुष्प से भगवती का पूजन करना लाभकारी रहता है. इस दिन पूजा में भोग लगाने के लिये नैवेद्ध के रुप में श्वेत मिष्ठान्न का प्रयोग किया जाता है. साथ ही इस दिन स्थिर लक्ष्मी का पूजन करने का विशेष महत्व है. धन त्रयोदशी के दिन देव धनवंतरी देव का जन्म हुआ था. धनवंतरी देव, देवताओं के चिकित्सकों के देव है. यही कारण है कि इस दिन चिकित्सा जगत में बडी-बडी योजनाएं प्रारम्भ की जाती है. धनतेरस के दिन चांदी खरीदना शुभ रहता है.  

धनतेरस में क्या खरीदें 


लक्ष्मी जी व गणेश जी की चांदी की प्रतिमाओं को इस दिन घर लाना, घर- कार्यालय,. व्यापारिक संस्थाओं में धन, सफलता व उन्नति को बढाता है. इस दिन भगवान धनवन्तरी समुद्र से कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिये इस दिन खास तौर से बर्तनों की खरीदारी की जाती है. इस दिन बर्तन, चांदी खरीदने से इनमें 13 गुणा वृ्द्धि होने की संभावना होती है. इसके साथ ही इस दिन सूखे धनिया के बीज खरीद कर घर में रखना भी परिवार की धन संपदा में वृ्द्धि करता है. दीपावली के दिन इन बीजों को बाग/ खेतों में लागाया जाता है ये बीज व्यक्ति की उन्नति व धन वृ्द्धि के प्रतीक होते है. 


धन तेरस पूजन 


धन तेरस की पूजा शुभ मुहुर्त में करनी चाहिए. सबसे पहले तेरह दीपक जला कर तिजोरी में कुबेर का पूजन करना चाहिए. देव कुबेर का ध्यान करते हुए, भगवान कुबेर को फूल चढाएं और ध्यान करें, और कहें, कि हे श्रेष्ठ विमान पर विराजमान रहने वाले, गरूडमणि के समान आभावाले, दोनों हाथों में गदा व वर धारण करने वाले, सिर पर श्रेष्ठ मुकुट से अलंकृ्त शरीर वाले, भगवान शिव के प्रिय मित्र देव कुबेर का मैं ध्यान करता हूँ. इसके बाद धूप, दीप, नैवैद्ध से पूजन करें. और निम्न मंत्र का जाप करें. 

'यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा ।' 

धनतेरस की कथा एक किवदन्ती के अनुसार एक राज्य में एक राजा था, कई वर्षों तक प्रतिक्षा करने के बाद, उसके यहां पुत्र संतान कि प्राप्ति हुई. राजा के पुत्र के बारे में किसी ज्योतिषी ने यह कहा कि, बालक का विवाह जिस दिन भी होगा, उसके चार दिन बाद ही इसकी मृ्त्यु हो जायेगी. ज्योतिषी की यह बात सुनकर राजा को बेहद दु:ख हुआ, ओर ऎसी घटना से बचने के लिये उसने राजकुमार को ऎसी जगह पर भेज दिया, जहां आस-पास कोई स्त्री न रहती हो, एक दिन वहां से एक राजकुमारी गुजरी, राजकुमार और राजकुमारी दोनों ने एक दूसरे को देखा, दोनों एक दूसरे को देख कर मोहित हो गये, और उन्होने आपस में विवाह कर लिया. ज्योतिषी की भविष्यवाणी के अनुसार ठीक चार दिन बाद यमदूत राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचें. यमदूत को देख कर राजकुमार की पत्नी विलाप करने लगी. यह देख यमदूत ने यमराज से विनती की और कहा की इसके प्राण बचाने का कोई उपाय बताईयें. इस पर यमराज ने कहा की जो प्राणी कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात में जो प्राणी मेरा पूजन करके दीप माला से दक्षिण दिशा की ओर मुंह वाला दीपक जलायेगा, उसे कभी अकाल मृ्त्यु का भय नहीं रहेगा. तभी से इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाये जाते है.

दीपावली के कुछ मजेदार किस्से : Meaning of Diwali Festival

दीपावली के  कुछ मजेदार किस्से  : Meaning of Diwali Festival 




दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य  धार्मिक ग्रंथों में दिवाली का महत्व : 

 दीपोत्सव का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य हैं जो इतिहास के पन्नों में अपना विशेष स्थान बना चुके हैं। इस पर्व का अपना ऐतिहासिक महत्व भी है, जिस कारण यह त्योहार किसी खास समूह का न होकर संपूर्ण राष्ट्र का हो गया है। आइए  जानते है दीपावली से जुड़े धार्मिक तथ्य...। 

 * विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएंगे।

 * महाप्रतापी तथा दानवीर राजा बलि ने अपने बाहुबल से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली, तब बलि से भयभीत देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर प्रतापी राजा बलि से तीन पग पृथ्वी दान के रूप में मांगी। महाप्रतापी राजा बलि ने भगवान विष्णु की चालाकी को समझते हुए भी याचक को निराश नहीं किया और तीन पग पृथ्वी दान में दे दी। 

 * त्रेतायुग में भगवान राम जब रावण को हराकर अयोध्या वापस लौटे तब उनके आगमन पर दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया और खुशियां मनाई गईं। 

* कार्तिक अमावस्या के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविन्दसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद से मुक्त होकर अमृतसर वापस लौटे थे। 

* बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के समर्थकों एवं अनुयायियों ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में हजारों-लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी।

 * कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध दीपावली के एक दिन पहले चतुर्दशी को किया था। इसी खुशी में अगले दिन अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं। 

* 500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं। 

* अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन शुरू हुआ था। 

* जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया। महावीर-निर्वाण संवत्‌ इसके दूसरे दिन से शुरू होता है। इसलिए अनेक प्रांतों में इसे वर्ष के आरंभ की शुरुआत मानते हैं।  

* यह भी कथा प्रचलित है कि जब श्रीकृष्ण ने आतताई नरकासुर जैसे दुष्ट का वध किया तब ब्रजवासियों ने अपनी प्रसन्नता दीपों को जलाकर प्रकट की।

 * राक्षसों का वध करने के लिए मां देवी ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्ररूप काली की पूजा का भी विधान है।

 * मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेते थे। 

* शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लाल किले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे। 

* पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय 'ओम' कहते हुए समाधि ले ली।

 * महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। 

* दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊंचे बांस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहॉंगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे। 

* सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक दीपावली के दिन हुआ था। इसलिए दीप जलाकर खुशियां मनाई गईं। 

* ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों (नदी के किनारे) पर बड़े पैमाने पर दीप जलाए जाते थे।

Sunday, 1 November 2015

स्वतंत्रता के बाद के सरदार पटेल जी को समझना है तो इस भाषण को सुने और पढ़े.

Deepak Kumar shared Agni Putra's post to the group: Desi.
16 hrs
We need few more Godse to save us from current gandhi type leaders .
God please send our Godse back


 आज मै वल्लभ भाई पटेल की ३ जनवरी १९४८ में कलकत्ता मैदान में ५ लाख लोगो की भीड़ में उनका दिया गया भाषण सुन रहा था.मै चाहता था की कांग्रेस और बीजेपी सरदार पटेल पर भले लड़ते रहे और उनके अंध भक्त यहाँ फेसबुक पर तलवारे निकालते रहे लेकिन यदि स्वतंत्रता के बाद के सरदार पटेल जी को समझना है तो इस भाषण को सुने और पढ़े.इस भाषण में सरदार पटेल जी ने ऐसा कुछ कहा है, जिस के कारण हमको नाथूराम गोडसे को, गांधी जी के हत्यारे के तगमे से, थोड़ा अलग हट के देखना होगा.इतिहास और अदालत में यह दर्ज है कि नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी जी की हत्या, का उद्देश्य, भारत को और दुर्दिन देखने से बचाने के लिए था.हत्या गोडसे कोई आतंकवादी नही थे. वो एक आम शख्स थे, मेरी और आप की तरह, जो गांधी जी को उसी उच्च स्थान पर रक्खे थे, जिस स्थान पर पूरा देश गांधी जी को रक्खे हुए था. बस उनको गांधी जी ही, उस वक्त के भारत में हुए बटवारे और खून खराबे के लिए जिम्मेदार लगे थे क्यों की वही, गोडसे के अनुसार, एक व्यक्ति थे , जो इस को रोक सकते थे.लेकिन गांधी तब तक अव्यवहारिक हो चुके थे और भारत की जनता से, सही बात न कहने और सुनने के कारण, महज एक साल में भारत का बटवारा हो गया था. गांधी जी की हत्या का इरादा तो था लेकिन उस पर आखरी मोहर या यह कह लीजिये अंतिम निर्णय १३ जनवरी १९४८ को गोडसे जी ने लिया था.ऐसा क्या था १३ जनवरी १९४८ को , जिससे गोडसे को लगा कि अब भारत गांधी जी की जिद्द और अव्यावहारिकता की और कीमत नही दे सकता है? दरअसल उस दिन गांधी जी की आमरण अनशन के आगे भारत झुक गया था.उस दिन भारत ने पाकिस्तान को ५५ करोड़ रुपय दे दिए थे. इस रुपय को पाकिस्तान को देने ने के खिलाफ, नेहरू के आलावा, सब थे और इसका कारण भी थासरदार वल्लभ भाई पटेल ने ३ जनवरी १९४८ को कलकत्ता के भाषण में इस बात का खुल के जिक्र किया है और वो ५५ करोड़ पाकिस्तान को देने के तब तक खिलाफ थे जब तक पाकिस्तान कश्मीर में खून खराबा नही बंद कर देता.लेकिन गांधी जी को कश्मीर में हो रहे खून खराबे से कोई मतलब नही था, उन्हें संत बने रहने का जनून था , उन हालातो में, भारत का वर्तमान और भविष्य, उनकी अपनी खुद की सोंच के आगे महत्वहीन हो गया था.अब मै उस भाषण के उस अंश को उद्धृत कर रहा हूँ जिसमे खुद पटेल जी को मसले को लेकर गुस्सा था.."जैसा लोगो का लोकमत हो, वैसा करना चाहिए.......................लेकिन यदि जो कश्मीर में चलता है, उस तरह चलता है, तो लोकमत की क्या जरुरत है ?हम लड़ाई कर के कश्मीर को ले ले तो? लोकमत की जगह कहाँ रही?तो, हम तो कहते है आज भी,लोकमत से करो, लेकिन हमारा सिपाही मरता रहे, हमारा पैसा खर्च करना पड़े और हमारे गाँव के गाँव जलाये जाते रहे और वहां हिन्दू और सिक्खो को तबाह किया जाये तो आखिर फिर लोकमत कहाँ रह गया?आखिर बंदूक से ही लेना होगा तो लेंगे और क्या करेंगे?दूसरी तरह से नही हो सकता है, तो नही!लेकिन हमने एक बात साफ़ की...................., कश्मीर की एक सूत जमीन हम छोड़ने वाले नही है................., कभी नही छोड़ेंगे.".आगे पटेल जी कहते है," तो आप देख लीजिये हमने फैसला किया तो जितनी चीज़ थी उस चीज़ में उदारता से ,हमने जितना उनका हिस्सा था उससे ज्यादा देने की हमने कोशिश की, लेकिन जब हमने उनका रूपया देने का किया तो उस समय हमने कहाँ, यदि आपको ५०० करोड़ रूपया चाहिए और इतना हिस्सा हमारा चाहिए, हम देने के लिए,,आपका हक हो न हो, ज्यादा हम देने को लिए भी हम तैयार है, लेकिन मैंने यह लिख के दिया था, यदि इस रुपये से गोली चलानी हो कश्मीर में, तो इस तरह से हम रुपये नही देंगे. हाँ, तुम्हारे में ताकत हो तो ले जाओ.ठीक है, लेकिन ख़ुशी से रूपया हम तब देंगे, जब फैसला तब होजाये की आपका रूपया है, उसमे कोई हम दखल नही देंगे, हमने आपके साथ मिल कर एक फैसला किया, एक consent डिक्री है, यह तो, कोर्ट में जाना न पड़े, लेकिन आपस में बैठ कर फैसला कर दिया तो यह डिक्री तब बजेगी , यह हुक्मनामा तब बजेगी जब,.हमारा फैसला हो जाये. तो कश्मीर का फैसला हो जाये, तो उस रोज आकर पैसा ले जाओ."यह थी, उस वक्त की आबो हवा भारत की.........उस वक्त की एक अहमक जिद्द ने अब तक भारत को जला रक्खा है. उस वक्त, गांधी जी ने, भारत की जनता और राजनैतिक सच्चाई को नजरंदाज कर के, आमरण अनशन कर के, भारत सरकार को झुका दिया और १३ जनवरी १९४८ को पाकिस्तान को ५५ करोड़ देने का फैसला भारत को करना पड़ा.कश्मीर जलता रहा, लोग मरते रहे , पाकिस्तान यह सब करता रहा लेकिन गांधी जी न महात्मा रह गये थे और ना ही एक राजनैतिज्ञ.मेरा पूरा यकीन है की भले गोली चलाने वाले गोडसे थे, लेकिन गोडसे, कई लोगो के अंदर भी थे. इसीलिए आज के काल में तो गोडसे ज्यादा प्रसंगिक हो गए है.हमे, काल अजीब विरोधाभास दिखा रहा है. जितने दूर दृष्टि वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल थे और उन्हें आगे आने वाली विपत्तियों का पूरा अंदेशा था, वहीं उतना ही गोडसे भी दूर दृष्टि वाले थे और आगे आने वाले समय के लिए आशंकित थे.आज तक गोडसे निन्दिय रहे है, लेकिन उनकी इतिहासिक भूमिका अमिट है. आज उनके लिए निंदा का स्वर मध्यम होता जा रहा है और गांधी जी पर उनके अंतिम काल में लिए गए निर्णयों पर प्रश्न चिन्ह भी लगने लगे है.जैसे चन्द्रशेखर आजाद , भगत सिंह को, भारतीय जन मानस उच्चतम कोटि का देश भक्त और आज़ादी का सपूत मानता है लेकिन उन्ही लोगो की गांधी जी और उनके अनुयायी आलोचना करते रहे थे . इतिहास के कुछ सरकारी ग्रंधो में वो आतंकवादी ही बताये गए है. उसी तरह गोडसे का भी पुनर मूल्याङ्कन करना पड़ेगा.