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Thursday, 15 November 2012

हमारा दांपत्य जीवन नर्क क्यों बना हुआ है??

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हमारा दांपत्य जीवन नर्क क्यों बना हुआ है||ओशो ||
नवभारत टाइम्स |

आप जान कर हैरान होंगे कि प्रेम और सेक्स परस्पर दो विरोधी चीजें हैं। प्रेम जितना विकसित होता है , सेक्स उतना ही क्षीण हो जाता है। और प्रेम जितना कम होता है , सेक्स उतना ज्यादा हो जाता है। अगर आप प्रेम से भर जाएं , तो भीतर सेक्स जैसी कोई चीज नहीं रह जाएगी। और अगर भीतर कोई प्रेम नहीं है , तो समझो कि सब सेक्स ही सेक्स भरा है।

सेक्स की शक्ति का परिवर्तन , उसका उदात्तीकरण प्रेम में होता है। वह सेक्स से मुक्त होना है , इसलिए सेक्स को दबाने से कुछ भी न होगा। उसे दबा कर कोई पागल हो सकता है। दुनिया में जितने पागल हैं , उनमें से सौ में से नब्बे वैसे हैं , जिन्होंने सेक्स को दबाने की कोशिश की है।

और शायद आपको यह भी पता हो कि सभ्यता जितनी विकसित होती है , उतने पागल बढ़ जाते हैं , क्योंकि सभ्यता सबसे ज्यादा दमन सेक्स का करती है। हर आदमी खुद को सभ्य दिखाने की कोशिश में अपने सेक्स को दबाता है। वह दबा हुआ सेक्स विक्षिप्तता पैदा करता है और अंतत : मानसिक रोगी बना देता है। ढेर सारे साधु इसीलिए पागल होते पाए जाते हैं। उसका कोई कारण नहीं है , सिवाय इसके कि वे सेक्स को दबाने में लगे हुए हैं।

यदि वे प्रेम के द्वार खोलें तो जो सेक्स की लपटें मालूम होती थीं , वे प्रेम का प्रकाश बन जाएंगी। प्रेम को विस्तृत करें। प्रेम सेक्स का सृजनात्मक उपयोग है। जीवन को प्रेम से भरें। आप कहेंगे हम सब प्रेम करते हैं। मैं आपसे कहूं , आप शायद ही प्रेम करते हों , आप प्रेम चाहते होंगे। और इन दोनों में जमीन - आसमान का फर्क है। प्रेम करना और प्रेम चाहना - ये बड़ी अलग बातें हैं।

छोटे - छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं। मां उनको प्रेम देती है। फिर वे बड़े होते हैं। वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं , परिवार उनको प्रेम देता है। फिर वे और बड़े होते हैं। अगर वे पति हुए , तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं। अगर वे पत्नियां हुईं , तो वे अपने पतियों से प्रेम चाहती हैं। और जो भी प्रेम चाहता है , वह दुख झेलता है। क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता , प्रेम केवल किया जाता है। चाहने में पक्का नहीं है कि मिलेगा या नहीं मिलेगा। और जिससे तुम चाह रहे हो , वह भी तुमसे चाहेगा। तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। दोनों भिखारी मिल जाएंगे और भीख मांगेंगे।

दुनिया में दांपत्य जीवन नर्क बना हुआ है , क्योंकि हम सब प्रेम मांगते हैं , देना कोई भी जानता नहीं है। दुनिया में जितना पति - पत्नियों का संघर्ष है , उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक - दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं और देने में कोई भी समर्थ नहीं है। इसे थोड़ा विचार करके देखना आप अपने मन के भीतर। आप चाहते हैं , कोई प्रेम करे। और जब कोई प्रेम करता है , तो अच्छा लगता है। लेकिन आपको पता नहीं है , वह दूसरा भी प्रेम सिर्फ इसलिए कर रहा है , क्योंकि वह अपने लिए प्रेम चाहता है। तो आपका या उसका प्रेम करना वैसा ही है , जैसे मछलियों को फंसाने के लिए आटा फेंकना। आटा वह मछलियों के लिए नहीं फेंक रहा है। आटा वह मछलियों को फांसने के लिए फेंक रहा है।

इस दुनिया में जितने लोग प्रेम करते हुए दिखाई पड़ते हैं , वे केवल प्रेम पाने के लिए आटा फेंक रहे हैं। और दूसरा व्यक्ति भी जो उस आंटे में दिलचस्पी दिखा कर आपके निकट आ रहा है , वह इसलिए उत्सुक है कि शायद इस आदमी से प्रेम मिलेगा। इसलिए वह भी थोड़ा प्रेम प्रदर्शित करेगा। थोड़ी देर बाद उसको पता चलेगा कि कोई किसी को प्रेम नहीं दे रहा है और तब संघर्ष की शुरुआत हो जाएगी।

( ओशो इंटरनैशनल फाउंडेशन के सौजन्य से )
हमारा दांपत्य जीवन नर्क क्यों बना हुआ है||ओशो ||
नवभारत टाइम्स |

आप जान कर हैरान होंगे कि प्रेम और सेक्स परस्पर दो विरोधी चीजें हैं। प्रेम जितना विकसित होता है , सेक्स उतना ही क्षीण हो जाता है। और प्रेम जितना कम होता है , सेक्स उतना ज्यादा हो जाता है। अगर आप प्रेम से भर जाएं , तो भीतर सेक्स जैसी कोई चीज नहीं रह जाएगी। और अगर भीतर कोई प्रेम नहीं है , तो समझो कि सब सेक्स ही सेक्स भरा है। 

सेक्स की शक्ति का परिवर्तन , उसका उदात्तीकरण प्रेम में होता है। वह सेक्स से मुक्त होना है , इसलिए सेक्स को दबाने से कुछ भी न होगा। उसे दबा कर कोई पागल हो सकता है। दुनिया में जितने पागल हैं , उनमें से सौ में से नब्बे वैसे हैं , जिन्होंने सेक्स को दबाने की कोशिश की है। 

और शायद आपको यह भी पता हो कि सभ्यता जितनी विकसित होती है , उतने पागल बढ़ जाते हैं , क्योंकि सभ्यता सबसे ज्यादा दमन सेक्स का करती है। हर आदमी खुद को सभ्य दिखाने की कोशिश में अपने सेक्स को दबाता है। वह दबा हुआ सेक्स विक्षिप्तता पैदा करता है और अंतत : मानसिक रोगी बना देता है। ढेर सारे साधु इसीलिए पागल होते पाए जाते हैं। उसका कोई कारण नहीं है , सिवाय इसके कि वे सेक्स को दबाने में लगे हुए हैं। 

यदि वे प्रेम के द्वार खोलें तो जो सेक्स की लपटें मालूम होती थीं , वे प्रेम का प्रकाश बन जाएंगी। प्रेम को विस्तृत करें। प्रेम सेक्स का सृजनात्मक उपयोग है। जीवन को प्रेम से भरें। आप कहेंगे हम सब प्रेम करते हैं। मैं आपसे कहूं , आप शायद ही प्रेम करते हों , आप प्रेम चाहते होंगे। और इन दोनों में जमीन - आसमान का फर्क है। प्रेम करना और प्रेम चाहना - ये बड़ी अलग बातें हैं। 

छोटे - छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं। मां उनको प्रेम देती है। फिर वे बड़े होते हैं। वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं , परिवार उनको प्रेम देता है। फिर वे और बड़े होते हैं। अगर वे पति हुए , तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं। अगर वे पत्नियां हुईं , तो वे अपने पतियों से प्रेम चाहती हैं। और जो भी प्रेम चाहता है , वह दुख झेलता है। क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता , प्रेम केवल किया जाता है। चाहने में पक्का नहीं है कि मिलेगा या नहीं मिलेगा। और जिससे तुम चाह रहे हो , वह भी तुमसे चाहेगा। तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। दोनों भिखारी मिल जाएंगे और भीख मांगेंगे। 

दुनिया में दांपत्य जीवन नर्क बना हुआ है , क्योंकि हम सब प्रेम मांगते हैं , देना कोई भी जानता नहीं है। दुनिया में जितना पति - पत्नियों का संघर्ष है , उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक - दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं और देने में कोई भी समर्थ नहीं है। इसे थोड़ा विचार करके देखना आप अपने मन के भीतर। आप चाहते हैं , कोई प्रेम करे। और जब कोई प्रेम करता है , तो अच्छा लगता है। लेकिन आपको पता नहीं है , वह दूसरा भी प्रेम सिर्फ इसलिए कर रहा है , क्योंकि वह अपने लिए प्रेम चाहता है। तो आपका या उसका प्रेम करना वैसा ही है , जैसे मछलियों को फंसाने के लिए आटा फेंकना। आटा वह मछलियों के लिए नहीं फेंक रहा है। आटा वह मछलियों को फांसने के लिए फेंक रहा है। 

इस दुनिया में जितने लोग प्रेम करते हुए दिखाई पड़ते हैं , वे केवल प्रेम पाने के लिए आटा फेंक रहे हैं। और दूसरा व्यक्ति भी जो उस आंटे में दिलचस्पी दिखा कर आपके निकट आ रहा है , वह इसलिए उत्सुक है कि शायद इस आदमी से प्रेम मिलेगा। इसलिए वह भी थोड़ा प्रेम प्रदर्शित करेगा। थोड़ी देर बाद उसको पता चलेगा कि कोई किसी को प्रेम नहीं दे रहा है और तब संघर्ष की शुरुआत हो जाएगी। 

( ओशो इंटरनैशनल फाउंडेशन के सौजन्य से )
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