ad

Monday, 26 November 2012

दिल सच्चे प्रीतम के लिए रखो बाकी सब कुछ बाँट दो

-->
ख्वाजा हाफिज़ शीराजी ईरान में एक पहुंचे सूफी फकीर हुए हैं | क्योंकि मुसलमानों में शराब से मुसल्ला (वह कपड़ा जिस पर बैठ कर नमाज़ अदा की जाती है ) रंगना कुफ्र का कलमा है, कहते हैं जब आपने अपने दीवान में यह बात कही कि 'बमै सज्जाद; रंगीकुन गारत पीरे मुगाँ गोयद' (अर्थात अगर मुर्शिद हुक्म दे तो शराब से मुसल्ला रंग ले ) तो पूरे ईरान में शोर मच गया कि ख्वाजा साहिब ने 'शराब में मुसल्ला रंग दो' - यह कुफ्र क
ा कलमा कहा है | अब हर धर्म में ऐसे लोग होते हैं जो अपने आप की चौकीदारी कम, दुसरे की चौकीदारी में बड़ी दिलचस्पी लेते हैं | कट्टर मौलवियों के कान खड़े हो गए और तुरंत काजी के पास पहुँच गए |

पहले इन्साफ करना काजियों के हाथ में होता था | वह काजी अक्लमंद था और शरियत से ज्यादा हकीकत में यकीन रखता था | मुल्लाओं ने बड़े जोश-खरोश के साथ काजी को बताया कि हाफिज़ साहिब ने कुफ्र का कलमा कहा है | काजी साहिब ने सोचा कि एक सूफी फकीर ऐसा क्यों बोल सकता हैं, हो सकता है कि कुछ राज़ हो | उसने कहा कि मैं तहकीकात करूँगा | वह हाफिज़ साहिब के पास आया कि तुमने कुफ्र का कलमा कहा है, या तो इसका मतलब समझाओ नहीं तो इसको वापिस ले लो | ख्वाजा हाफीज़ ने कहा कि फकीर अपना कलाम वापिस नहीं लेते; क्योंकि जो परवरदिगार ने अन्दर से हुक्म दिया मैंने बाहर फरमा दिया | काजी हैरान था क्योंकि हाफीज़ साहिब के माथे पर खुदा का नूर टपक रहा था, इसलिए फिर उनसे गुजारिश कि वो इसका मतलब समझायें | हाफ़िज़ साहिब ने कहा कि वह सामने जो पहाडी है, वहाँ एक फकीर बैठा है, उसके पास जाओ, वह तुम्हारे सवाल का ज़बाब देगा | काजी हैरान था पर साथ में उत्सुक भी था | इसलिए वह उस फकीर के पास गया और उससे इस कलाम का मतलब पूछा तो उसने कहा कि वह जो सामने शहर है, उसमे एक अमुक मकान है, वहाँ एक वेश्या है | उसके पास जाओ | यह लो दो रूपये ले जाओ | वह वेश्या तुम्हारे सवाल का ज़बाब देगी |

काजी ने सोचा कि अजीब तरह के फकीरों से पला पडा है | एक कहता है कि मुसल्ला शराब में रंग लो, दूसरा कहता है कि वेश्या के घर जाओ | खैर ! काजी ने सोचा कि इस मामले की जड़ तक जाना ज़रूरी है | चालों देखें तो सही क्या मामला है |

आखिर काजी भेष बदल कर वहाँ से उस शहर में गया | वेश्या का मकान पूछ कर वहाँ चला गया | लेकिन वेश्या वहाँ पर नहीं थी | लेकिन उस कोठे की मालकिन घर पर थी | जब काजी ने दो रूपये उसे पकडाए तो बड़ी खुश हुई | सोचा की मेहमान अमीर मालूम होता है, आसामी मोटी है, बहुत कुछ हासिल होगा इसलिए खाली हाथ इसे नहीं जाने देना चाहिए |

उन्होंने एक लडकी पाली हुई थी | अब वह ज़वान हो गयी थी, उस लडकी से कहा, "देख, हम जो काम करते हैं तुझे पता है, हमारा पेशा ही ऐसा है | इसलिए तुझे भी यह काम करना पड़ेगा | देख इसी काम के लिए हमने तुझे खरीदा है | अब तू ज़वान हो गयी है | बड़ी मोटी आसामी आयी है वह हाथ से नहीं जानी चाहिए | आखिर उस लडकी को वेश्या के कपडे पहनाकर काजी के कमरे में छोड़ आयी | लेकिन वह लडकी बड़ी उदास थी | आँखों से आँसू बह रहे थे | काजी ने सोचा कि अगर ये वेश्या होती तो हँसी-खुशी के साथ आती; लेकिन ये वेश्या नहीं है, यह और कुछ मामला है | यह सोच कर काजी ने कहा, " बेटी डरो मत, मैं तुम्हे कुछ नहीं कहता | बता तू कौन है ?" लडकी ने धीरे-धीरे, रोते-रोते ज़बाब दिया कि मैं मुसीबत की मारी हुई हूँ | आज तक मैं नेक-पाक रही, लेकिन आज पहली बार मैं बुरे कामों में पड़ने जा रही हूँ | मालूम नहीं क्या हाल होगा ?

काजी ने कहा कि तू डर मत | मैं तुझे कुछ नहीं कहता | सच-सच बता तू कौन है ? लडकी कहने लगी कि मुझे थोडा-थोडा याद है कि मैं जब छोटी थी, हमारे गाँव में डाका पडा था | सब लोग भाग गए | में भी भागी पर डाकुओं ने मुझे पकड़ लिया | वे यहाँ मुझे बेच गए | काजी ने पूछा कि तेरा कौन सा गाँव था ? लडकी ने कहा, मुझे थोडा-थोडा याद है कि मेरा अमुक गाँव था | वही काजी का गाँव था | काजी ने सोचा कि यह तो अपने ही गाँव की लडकी है | फिर पूछा कि तेरे मुहल्ले का क्या नाम था ? लडकी ने कहा, मुझे थोडा-थोडा याद है कि हमारे मुहल्ले का यह नाम था | वह काजी का अपना मुहल्ला था | अब मुहल्ले की लडकी, और पूछने का विचार आया | उसने पूछा कि तेरे बाप का क्या नाम था ? लडकी ने कहा कि जब में छोटी थी पर मुझे थोडा-थोडा याद है कि मेरे बाप का यह नाम था | वह काजी साहिब का ही नाम था | रोकर गले से लगा लिया और बोला कि तू मेरी ही लडकी है | तूझे ही डाकू पकड़ कर ले गए थे | लडकी की बाहँ पकड़ कर काजी उसे उस फकीर के पास ले गया | उनसे कहा कि बाहर से तो तुमने मुझे काम के लिए भेजा था, लेकिन अन्दर कोई और ही राज़ था | मुझे अब पता चला कि अन्दर से तुम्हारा मतलब लडकी से मिलाना था |

फकीर ने कहा कि ख्वाजा साहिब से कहो इसका अगला मिसरा भी कह दें | जब हाफिज़ साहिब के पास आया तो बोला कि अगला मिसरा भी कह दें | तब हाफ़िज़ ने कहा :

के सालिक बेखबर न बवद ज़ राहे रस्मे मंज़िल्हा |

अर्थात मार्ग-दर्शक मंजिल की राह के भेद और रीति से अनजान नहीं है |

कामिल फकीर कुल मालिक की भेजी हुई सरकार होते है और उसकी रज़ा में रहते हैं | वह शरीयत के पाबंद नहीं होते हैं बल्कि हकीकत के मंज़र के वाकिफकार होते हैं | संसार में एक ही मार्ग है, वह है परमार्थ का मार्ग | भटके हुए जीवों को सही रास्ते पर लाने के लिए संतों के अपने ही तरीके होते हैं |

संसार में रहते हुए सम्बन्धियों, मित्रों, स्त्री और बच्चों को सब पदार्थ दे दो , पर दिल किसी को न दो | दिल तो परमात्मा की अमानत (धरोहर) है | अमानत में खयानत न करो | दिल सच्चे प्रीतम के लिए रखो बाकी सब कुछ बाँट दो |

जब मनुष्य प्रेम के भेद को पाकर पागल हो जायेगा, और उसके सौ दावों को जान कर सौदाई (सौ + दाई ) हो जायेगा तो उसको और-और अक्लों और होशियारियों की क्या ज़रुरत ? हाफ़िज़ साहिब फरमाते हैं कि तू दीवाना हो जा ताकि दुसरे लोग तेरी फिक्र करें, क्योंकि जितनी इंसानी अक्ल ज्यादा होगी उतने ही दुनिया के फिक्र अधिक सतावेंगी |

दीवाना बाश ता गमें तू दीगरां खुरन्द |
आं रा कि अक्ल बेश गमे रोज़गार बेश ||


ईश्क की दीवानगी से बेहतर कोई इलाज नहीं | इसके ज़रिये दुनिया के बन्धनों के लंगर टूट जाते हैं | बहुत से लोग अपनी सीमित बुद्धि के कारण, प्रीतम से काफिर (बेमुख) होते जाते हैं | क्या तुमने कभी दीवानगी के कारण किसी को काफिर होते देखा है ? अगर तुझे दीवानगी के पर मिल जाये तो तू मसीह की तरह आसमानों पर उड़ जायेगा | प्रेम की दीवानगी हमारे लिए परमार्थ के भेद खोल देती है |

रूहानियत के रास्ते में प्रेमोन्मत्तों को ही स्थान मिलता है | यहाँ सब होशियारों के पैर फिसल जातें हैं अर्थात यहाँ चतुरों को मान नहीं मिलता है | उनकी मिटटी पलीत होती है | उनकी इस मार्ग में क्या गिनती है:

कलाहे जुमला हुशियारा रबूदंद,
दरी बाज़ार कूचा जाए मस्ता | (शम्स तबरेज़)

गुरुवाणी भी यही कहती है की लाखों चतुराईयाँ और सयानेपन हमारे लिए बंधन का कारण है और मालिक की प्राप्ति में सहायक नहीं:

सहस सिआणपा लख होहि टी इक न चलै नालि ||

आत्मा के अन्तकरण पर चार परदे हैं - चित्त, मन, बुद्धि और अहंकार | ये सब उतर जाये तो आत्म-साक्षात्कार होता है | चित्त चिन्तन छोड़ दे और मन के साथ बुद्धि भी काम करने से रह जाए तो परमार्थ में कदम बढते हैं | उपनिषद में कथन है, " यदि ज्ञान-इन्द्रियां और मन खडा हो जाए और बुद्धि भी स्थिर हो जाये तो परम-गति प्राप्त होती है |"

यदा पश्चावातिस्थन्ते ज्ञानानी मनसा सह |
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहू: परमां गतिम् || (कठ, २-३-१०)

हुस्न नाशवान है पर सच्चा प्यार, मुहब्बत या चाह कभी नष्ट नहीं होती | हुस्न चाहे नष्ट हो जाए, नजाकत न रहे, नाज़-अंदाज़ जाते रहें, मनमोहिनी सुन्दरता लुप्त हो जाए पर सच्ची मोहब्बत कभी ख़त्म नहीं होती क्योंकि वह आत्मा में घुल चुकी होती है | जिस हुस्न की बुनियाद शरीर पर है वह बेबुनियाद है | असली हुस्न आत्मा के नूर से होता है | संतों, फकीरों का हुस्न रूहानी होता है | उनके चेहरे से खुदा का नूर टपकता है | जिस बुलबुल सचमुच के, ताज़े और खिले हुए फूल पर फ़िदा होती है, दीवार पर अंकित या चित्रकारी के फूल उसको कभी लुभा नहीं सकते |

यहाँ हुस्न नहीं, इश्क भी पैदा नहीं होता.
बुलबुल गुले-दीवार पै शैदा नहीं होता |
-->

No comments:

Post a Comment