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Tuesday, 13 November 2012

‘आतिशबाज़ी’ का इतिहास ?

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‘आतिशबाज़ी’ का इतिहास ?

आज तो आप दीवाली की तैयारियों में व्यस्त होंगे. और हो भला क्यों नहीं, आख़िर दीवाली सबसे बड़ा और प्रमुख त्योहार जो है. दीवाली का त्योहार हो और पटाखे न छोड़े, आतिशबाज़ी न करें, ऐसा शायद संभव ही नहीं… लेकिन क्या आप इस ‘आतिशबाज़ी’ का इतिहास जानते हैं…? नहीं ना! तो आईए हम आपको बताते हैं…....

दरअसल पटाखों का आविष्कार एक दुर्घटना के कारण चीन में हुआ. मसालेदार खाना बनाते समय एक रसोइए ने गलती से साल्टपीटर (पोटैशियम नाईट्रेट) आग पर डाल दिया था. इससे उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं, जिस से लोगों की उत्सुकता बढ़ी. फिर रसोइए के प्रधान ने साल्टपीटर के साथ कोयले व सल्फर का मिश्रण आग के हवाले कर दिया, जिससे काफी तेज़ आवाज़ के साथ रंगीन लपटें उठी. बस, यहीं से आतिशबाज़ी यानी पटाखों की शुरुआत हुई.

वैसे पटाखों का पहला प्रमाण वर्ष 1040 में मिलता है, जब चीनियों ने इन तीन चीज़ों के साथ कुछ और रसायन मिलाते हुए कागज़ में लपेट कर ‘फायर पिल’ बनाई थी.

आतिशबाज़ी को रंगीन बनाने के लिए उसमें स्ट्रोंशियम तथा बोरियम नामक धातुओं के लवणों का इस्तेमाल किया जाता है, इन्हें पोटैशियम क्लोरेट के साथ मिलाते हैं. स्ट्रोंशियम नाइट्रेट लाल रंग पैदा करता है जबकि स्ट्रोंशियम कार्बोनेट पीला रंग उत्पन्न करता है. बेरियम के लवणों से हरा रंग तथा स्ट्रोंशियम सल्फेट से हल्का आसमानी रंग पैदा होता है. इस तरह आतिशबाज़ी के दौरान अनेक रंग पैदा हो जाते हैं जो उसे खुबसूरत बनाते हैं.

खैर, पटाखे बनाने की कला भारत सहित अन्य पूर्वी देशों को भी आती थी. यूरोप में पटाखों का चलन सबसे पहले वर्ष 158 में हुआ था. यहां सबसे पहले पटाखों का उत्पादन इटली ने किया था. जर्मनी के लोग युद्ध के मैदानों में इन बमों का इस्तेमाल करते थे. चीन के लोग किसी समारोह आदि में इन बमों का इस्तेमाल करते थे.

इंग्लैंड में भी इनका उपयोग समारोहों में किया जाता था. महाराजा चार्ल्स (पंचम) अपनी हरेक विजय का जश्न आतिशबाज़ी करके मनाते थे. इस तरह से 14 वीं शताब्दी के शुरू होते ही लगभग सभी देशों ने बम बनाने का काम शुरू कर दिया था.

अमेरिका में इसकी शुरूआत 16वीं शताब्दी में मिलीट्री ने की थी. इसकी प्रतिक्रिया में पटाखें बनाने की कई कंपनियां खुली और सैकड़ों लोगों को रोज़गार मिला. बाद में पश्चिमी देशों ने हाथ से फेंके जाने वाले बम बनाए. बंदूके और तोप भी इसी कारण बनी थी.

आतिशबाज़ी से जुड़ी कुछ और बातें…

1892 में अमेरिका में कोलंबस के आगमन की चौथी शताब्दी पर ब्रकलिन ब्रिज पर जमकर आतिशबाज़ी की गई थी. इसे करीब 10 लाख लोगों ने देखा था.

पटाखों से होने वाले खतरों को देखते हुए अमेरिका में 19वीं शताब्दी के अंत में “सोसायटी फॉर सप्रेशन ऑफ अननेससरी नाइस” का गठन किया था.

कुछ सालों पहले जापान में एक ऐसी रंगीन आतिशबाज़ी का प्रदर्शन किया गया था जो 3 हज़ार फुट की ऊंचाई पर जाकर 2 हज़ार फुट के व्यास में बिखर गई थी.

सबसे लंबा पटाखा छोड़ने का प्रदर्शन 20 फरवरी, 1988 को यूनाईटेट ग्लाएशियन यूथ मूवमेंट द्वारा किया गया था. यह प्रदर्शन 9 घंटे 27 मिनट तक जारी रहा और इसमें 3338777 पटाखों तथा 666 किलोग्राम बारूद का इस्तेमाल किया था.

भारत में पटाखें बनाने का मुख्य केन्द्र शिवाकाशी है जो कि एक छोटा शहर है, लेकिन इसके लिए संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है.

ये थी आतिशबाज़ी के इतिहास की कहानी, लेकिन इससे हमारी सेहत, पर्यावरण और जान को भी खतरा है. ऐसे में इससे दूर ही रहें तो बेहतर है!

आखिर में आप सभी को दीवाली की मुबारकबाद….
‘आतिशबाज़ी’ का इतिहास ?

आज तो आप दीवाली की तैयारियों में व्यस्त होंगे. और हो भला क्यों नहीं, आख़िर दीवाली सबसे बड़ा और प्रमुख त्योहार जो है. दीवाली का त्योहार हो और पटाखे न छोड़े, आतिशबाज़ी न करें, ऐसा शायद संभव ही नहीं… लेकिन क्या आप इस ‘आतिशबाज़ी’ का इतिहास जानते हैं…? नहीं ना! तो आईए हम आपको बताते हैं…....

दरअसल पटाखों का आविष्कार एक दुर्घटना के कारण चीन में हुआ. मसालेदार खाना बनाते समय एक रसोइए ने गलती से साल्टपीटर (पोटैशियम नाईट्रेट) आग पर डाल दिया था. इससे उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं, जिस से लोगों की उत्सुकता बढ़ी. फिर रसोइए के प्रधान ने साल्टपीटर के साथ कोयले व सल्फर का मिश्रण आग के हवाले कर दिया, जिससे काफी तेज़ आवाज़ के साथ रंगीन लपटें उठी. बस, यहीं से आतिशबाज़ी यानी पटाखों की शुरुआत हुई.

वैसे पटाखों का पहला प्रमाण वर्ष 1040 में मिलता है, जब चीनियों ने इन तीन चीज़ों के साथ कुछ और रसायन मिलाते हुए कागज़ में लपेट कर ‘फायर पिल’ बनाई थी.

आतिशबाज़ी को रंगीन बनाने के लिए उसमें स्ट्रोंशियम तथा बोरियम नामक धातुओं के लवणों का इस्तेमाल किया जाता है, इन्हें पोटैशियम क्लोरेट के साथ मिलाते हैं. स्ट्रोंशियम नाइट्रेट लाल रंग पैदा करता है जबकि स्ट्रोंशियम कार्बोनेट पीला रंग उत्पन्न करता है. बेरियम के लवणों से हरा रंग तथा स्ट्रोंशियम सल्फेट से हल्का आसमानी रंग पैदा होता है. इस तरह आतिशबाज़ी के दौरान अनेक रंग पैदा हो जाते हैं जो उसे खुबसूरत बनाते हैं.

खैर, पटाखे बनाने की कला भारत सहित अन्य पूर्वी देशों को भी आती थी. यूरोप में पटाखों का चलन सबसे पहले वर्ष 158 में हुआ था. यहां सबसे पहले पटाखों का उत्पादन इटली ने किया था. जर्मनी के लोग युद्ध के मैदानों में इन बमों का इस्तेमाल करते थे. चीन के लोग किसी समारोह आदि में इन बमों का इस्तेमाल करते थे.

इंग्लैंड में भी इनका उपयोग समारोहों में किया जाता था. महाराजा चार्ल्स (पंचम) अपनी हरेक विजय का जश्न आतिशबाज़ी करके मनाते थे. इस तरह से 14 वीं शताब्दी के शुरू होते ही लगभग सभी देशों ने बम बनाने का काम शुरू कर दिया था.

अमेरिका में इसकी शुरूआत 16वीं शताब्दी में मिलीट्री ने की थी. इसकी प्रतिक्रिया में पटाखें बनाने की कई कंपनियां खुली और सैकड़ों लोगों को रोज़गार मिला. बाद में पश्चिमी देशों ने हाथ से फेंके जाने वाले बम बनाए. बंदूके और तोप भी इसी कारण बनी थी.

आतिशबाज़ी से जुड़ी कुछ और बातें…

1892 में अमेरिका में कोलंबस के आगमन की चौथी शताब्दी पर ब्रकलिन ब्रिज पर जमकर आतिशबाज़ी की गई थी. इसे करीब 10 लाख लोगों ने देखा था.

पटाखों से होने वाले खतरों को देखते हुए अमेरिका में 19वीं शताब्दी के अंत में “सोसायटी फॉर सप्रेशन ऑफ अननेससरी नाइस” का गठन किया था.

कुछ सालों पहले जापान में एक ऐसी रंगीन आतिशबाज़ी का प्रदर्शन किया गया था जो 3 हज़ार फुट की ऊंचाई पर जाकर 2 हज़ार फुट के व्यास में बिखर गई थी.

सबसे लंबा पटाखा छोड़ने का प्रदर्शन 20 फरवरी, 1988 को यूनाईटेट ग्लाएशियन यूथ मूवमेंट द्वारा किया गया था. यह प्रदर्शन 9 घंटे 27 मिनट तक जारी रहा और इसमें 3338777 पटाखों तथा 666 किलोग्राम बारूद का इस्तेमाल किया था.

भारत में पटाखें बनाने का मुख्य केन्द्र शिवाकाशी है जो कि एक छोटा शहर है, लेकिन इसके लिए संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है.

ये थी आतिशबाज़ी के इतिहास की कहानी, लेकिन इससे हमारी सेहत, पर्यावरण और जान को भी खतरा है. ऐसे में इससे दूर ही रहें तो बेहतर है!

आखिर में आप सभी को दीवाली की मुबारकबाद….
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