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Saturday, 11 August 2012

ईर्ष्या.............15712

एक बार एक गुरु ने अपने सभी शिष्यों से
अनुरोध किया कि वे कल प्रवचन में आते समय
अपने साथ एक थैली में बड़े-बड़े पके हुए आलू साथ लेकर आएं।
उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए, जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं।
जो शिष्य जितने व्यक्तियों से ईर्ष्या करता है,
वह उतने आलू लेकर आए।
अगले दिन सभी शिष्य आलू लेकर आए।
किसी के पास चार आलू थे तो किसी के पास छह।
गुरु ने कहा कि अगले सात दिनों तक ये आलू वे
अपने साथ रखें। जहां भी जाएं, खाते-पीते, सोते-
जागते, ये आलू सदैव साथ रहने चाहिए।
शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन वे
क्या करते, गुरु का आदेश था। दो-चार दिनों के
बाद ही शिष्य आलुओं की बदबू से परेशान
हो गए। जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताए और
गुरु के पास पहुंचे। गुरु ने कहा, ‘यह सब मैंने
आपको शिक्षा देने के लिए किया था।
जब मात्र सात दिनों में आपको ये आलू बोझ
लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से
ईर्ष्या करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन
पर रहता होगा। यह ईर्ष्या आपके मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, जिसके कारण आपके मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक इन आलूओं की तरह। इसलिए अपने मन से गलत भावनाओं को निकाल दो, यदि किसी से प्यार नहीं कर
सकते तो कम से कम नफरत तो मत करो। इससे
आपका मन स्वच्छ और हल्का रहेगा।’ यह सुनकर
सभी शिष्यों ने आलुओं के साथ-साथ अपने मन से
ईर्ष्या को भी निकाल फेंका।

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