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Sunday, 5 August 2012

टीम अन्ना की राजनैतिक महत्वकांक्षा......15112


  • दोस्तों,

    पिछले कुछ दिनों से टीम अन्ना के राजनीतिक पार्टी बनाने पर चहुँ ओर चर्चा है...कुछ लोग इसके विरोध में हैं ओर कुछ लोग पक्ष में....मेरी राय कुछ यूँ है-

    सबसे पहले उन प्रश्नों का उत्तर जिसमे कहा गया है कि टीम अन्ना के राजनीती में आने से ये गलत हो जायेगा, वो गलत हो जायेगा.....तो ये बताईये कि क्या टीम अन्ना के आने से पहले हम एक स्वर्ग जैसी जिंदगी जी रहे थे ? क्या टीम अन्ना के आने से पहले इस देश में सब कुछ ठीक था ? और क्या टीम अन्ना के असफल होने पर ये देश फिर से सब कुछ ठीक
    हो जायेगा - भ्रष्टाचार ना होगा, मंहगाई ना होगी, आतंक ना होगा, बेरोज़गारी ना होगी, भुखमरी न होगी, जुर्म ना होगा ? फिर यकायक क्यों ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है कि जैसे इस देश में जो कुछ भी गलत है वो टीम अन्ना की देन है ?

    अब बात आती है कि क्या इस आन्दोलन की दिशा भटक गई है ? क्या रास्ता बदल लेना भटक जाना होता है ? क्या समय के अनुरूप अपनी रणनीति बदलना भटकना होता है ? रणभूमि में हालत देखकर ही आगे की रणनीति बनाई जाती है.....महाभारत में भी कदम कदम पर श्री कृष्ण ने रणभूमि में ही नई नई रणनीति बना कर पांडवो का मार्ग दर्शन किया...मेडिकल जगत में भी कई बार ऐसा होता है कि किसी बीमारी के इलाज के दौरान शुरुआत में आप्रेशन की जरुरत नहीं होती पर बाद में आप्रेशन करना भी पड़ जाता है !!

    बार बार तर्क दिये जा रहें हैं कि टीम अन्ना की राजनैतिक महत्वकांक्षा पहले से थी ... तो क्या आसमान टूट पड़ा इस बात से ? क्या राजनीती इतनी गन्दी है कि अच्छे लोगों को इसमें नहीं जाना चाहिये ? अगर इतनी ही गन्दी है तो फिर हम क्यों मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को ढो रहें हैं ? लोग पूछते हैं कि राजनीती की गंदगी में टीम अन्ना क्या कर पायेगी ? कहाँ से ईमानदार उम्मीदवार ले कर आएगी ? तो इसका मतलब ये मान लिया जाए कि इस देश की जनता और मीडिया इस बात पर सहमत हैं कि 121 करोड के इस देश में 545 ईमानदार इंसान मिलना ही असंभव है तो फिर इस पूरी बहस की सार्थिकता ही क्या है...फिर तो बात यहीं खत्म हो जानी चाहिये !! क्या हम नहीं चाहते कि इस देश कि संसद में फिर से लाल बहादुर शास्त्री, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, डॉ राजेंदर प्रसाद, लोहिया जी, जयप्रकाश नारायण जैसे नेता फिर से बैठें ? या फिर हम अंदर से इतने खोखले हो गए हैं कि इस बात पर हमें भरोसा ही नहीं होता....अगर संसद रूपी मंदिर की सफाई कर उसमे धूप-बत्ती करने की कोशिश की जा रही है तो फिर विरोध क्यों ?

    जो मीडिया बार बार भीड़ को ही सबसे बड़ा पैमाना मान कर इस आन्दोलन को असफल बता रहा था और इस आन्दोलन का ढंग से प्रसारण भी नहीं कर रहा था, अब अचानक एकदम से क्यों इसमें दिलचस्पी ले रहा है ? अपने अंदर झांक कर देखे मीडिया कि उसने किसका साथ दिया ? क्या कभी पत्रकारिता के मूल्यों को आगे रखकर उसने उन 15 मंत्रियों के खिलाफ लगे आरोपों कि तहकीकात की? क्या कभी उन भ्रष्ट मंत्रियों से स्टूडियो में बैठा कर पुछा गया कि असलियत क्या है ?

    रही बात उन लोगों की जो टीम अन्ना के आन्दोलन की आलोचना कर रहें हैं- वो लोग जो आज अपने घरों में बैठ कर टीम अन्ना को सलाह दे रहें हैं वो लोग उस वक्त कहाँ थे जब सड़कों पर आने का वक्त था ? क्यों नहीं कंधे से कंधा मिला कर उसका साथ दिया और उनके आन्दोलन को मजबूत किया ? क्यों नहीं इनकी आवाज़ में आवाज़ मिला कर बहरी-गूंगी सरकार के कानों तक इस देश की आवाज़ को पहुँचाया ? बिस्तर पर आराम से लेट कर ये बोलना कि वो ज्यादा बढ़िया रहता, ऐसा करते तो अच्छा होता- इन बातों का कोई मतलब नहीं....अगर जनता सड़कों पर होती तो सरकार को घुटने टेकने ही पड़ते..किसी पर ऊँगली उठाने से पहले सोंचे कि आपने क्या किया है इस देश से भ्रष्टाचार मिटने के लिए ?

    मुझे एक चीज़ का पता है- जिस लोकपाल का नाम तक भारत के अधिकांश लोग दो साल पहले तक नहीं जानते थे, आज ज्यादातर लोगों को इसके बारे में पता है, वो जागरूक हैं ...क्या ये कम उपलब्धि है टीम अन्ना के लिए ? इससे पहले कितनी बार लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ यूँ अनशन किया था ? कितने लोगों ने यूँ बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतर कर भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम चलाई थी ? कितने लोगों ने अपनी नौकरी छोड़ कर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अपनी जिंदगी झोंक दी ? क्या टीम अन्ना ने इस देश से कुछ लिया है ? क्या उन्होंने कुछ भ्रष्ट काम किया है ? सिर्फ कुछ देने की कोशिश ही तो की है....

    और अंत में, जो भी फैसला लिया है अन्ना ने ,उसमे चीजें कम -ज्यादा हो सकती हैं, कुछ फैसले विवादस्पद हो सकते हैं -पर उन पर ऊँगली उठाने का सवाल ही नहीं होता...ज्यादा से ज्यादा क्या होगा- राजनीती में वो हार जायेंगे..ठीक है- अगर इस देश की जनता उनको हारते हुए ही देखना चाहती है तो ऐसा ही सही... उनके असफल होने से अगर इस देश से भ्रष्टाचार खत्म होता है तो फिर जनता उन्हें हरा दे..बात ही खत्म.....सोच लेना कि कोई पागल,दीवाना आया था एक बेहतर हिन्दुस्तान बनाने का पर बेवक्त मारा गया और खुश रहना कि देश बच गया ऐसे पागलों से !!

    आपके अपने विचार हो सकते हैं और मेरे अपने...मुझे बस एक बात का पता है कि ये दीवाने लोग पूरी ईमानदारी से माँ भारती को समृद्ध और खुशहाल बनाने में जुटे हैं..हो सकता है कि कुछ गलतियाँ कर गए हों ...पर आज के इस राजनितिक गंदगी में किसी और से न कोई उम्मीद है और नहीं कोई आशा....अगर जनता को एक राजनीतिक विकल्प दे कर अन्ना इस देश की तस्वीर बदलना चाहते हैं तो किसी भी देश की चिंता करने वाले को क्या दिक्कत है? जो लोग अन्ना के समर्थक हैं पर उनका साथ देने सड़क पर नहीं आ सके तो अब आपके पास एक मौका है- अपने वोट से उन्हें हौसला दीजिए....

    दोस्तों, कुछ भी कहो, टीम अन्ना पर भरोसा करके हमारे पास पाने कि लिए तो बहुत कुछ है पर खोने के लिए कुछ भी नहीं.....क्योंकि अगर ये लोग ना भी रहें तो ये देश जहाँ है वहाँ से नीचे ही जा रहा है.....और कोई उम्मीद भी तो नहीं है हमारे पास इनके अलावा.....सोचो कि अगर ये लोग जीत गए तो ?

    इस बहस का कोई अंत नहीं है.... हजारों लोग और हजारों विचार....बस अपने -अपने रास्ते इस देश को बचा सकने का हर कोई प्रयास करे , यही परमात्मा से प्रार्थना है.....

    जय हिंद !! वंदे मातरम !!

1 comment:

  1. १००% सहमत हूँ आपसे,बहुत सटीक शब्दों में आपने बात को कहा है.शिशिर जैन

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