ad

Sunday, 8 July 2012

आरक्षण व्यवस्था का आखिर उद्देश्य क्या है? (13112)

लेखिका : नीरा जैन (गृहणी)
टोंक रोड, जयपुर
आरक्षण, जो आज देश का जवलंत मुद्दा बन चूका है। इस मुद्दे पर अपने कुछ विचार आप सब तक पहुँचाने के लिए काफी समय से सिर्फ सोच ही रही थी कि कुछ लिखा जाए, आज मन बनाकर कुछ लिखने की हिम्मत जुटाई है।
आरक्षण व्यवस्था का आखिर उद्देश्य क्या है? ये बात मेरी तो समझ में अब तक भी नहीं आ पा रही है, कि आखिर इस आरक्षण व्यवस्था का मकसद क्या है। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए आरक्षण के मुद्दे पर काफी कुछ जानकारी हासिल की तो हासिल हुआ कि भारत सरकार द्वारा भारतीय संविधान में निहित समता के अधिकार (अनु.- 14-18) के तहत पिछड़े वर्गो अल्पसंख्यको अनुसूचित जातियों एवम  जनजातियो को आरक्षण देने का सिर्फ एक उद्देश्य था और वह यह , इनको अन्य ऊंची एवम संपन्न जातियो के लोगो के बराबर का दर्जा दिया जा सके। अन्य सभी उच्च जातियो एवम वर्गों के साथ-साथ इन पिछड़े एवम शोषित लोगो का भी इस देश के विकास में बराबर का योगदान हो।
आरक्षण की व्यवस्था शुरू में 1960 में शुरू की गई थी और डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं कहा था कि- “हर दस साल में यह समीक्षा हो जिनको आरक्षण दिया जा रहा क्या उनकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ कि नहीं? उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप में कहा यदि आरक्षण से यदि किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो उसके आगे कि पीढ़ी को इस व्यवस्था का लाभ नही देना चाहिए क्योकि आरक्षण का मतलब वैसाखी नही है जिसके सहारे आजीवन जिंदगी जिया जाये,यह तो मात्र एक आधार है विकसित होने का ।”
जब सभी व्यक्ति सारी दुनिया मे समान रूप से पैदा होते है और समान रूप से मरते है तो भारत मे व्यक्ति जन्म से ऊँचा-नीचा कैसे हो सकता है। अर्थात भारत मे आरक्षण व्यवस्था की उत्पति का मूल कारण भारत की जाति व्यवस्था है। जब ब्राह्मणों द्वारा शूद्रो का निरन्तर शोषण किया जाता था और उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाता था। ऐसी स्थिति से शूद्रो को मुक्ति दिलाने के लिये सर्वप्रथम कोल्हापुर के राजा छत्रपति शाहू जी महाराज ने 26 जुलाई 1902 को अपने राज्य मे ब्राह्यणो व शेनवियोंय जाति को छोड़कर शेष सभी जातियो के लिये 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू की।
जब विधान मण्डलो मे आरक्षण की वकालत की गई तो सर्वप्रथम बाल गंगाधर तिलक ने यह कहकर विरोध किया की क्या तेली, तमोली, कुंभटो को संसद मे जाकर हल चलाना है। जिस पर ब्राह्मणों द्वारा बाल गंगाधर तिलक को लोकमान्य की उपाधि प्रदान की। मोहन दास करमचन्द गाँधी ने हर तरह के आरक्षण का साम्प्रदायिक नाम देकर विरोध किया। जवाहर लाल नेहरू ने आरक्षण के लिए कहा कि इससे दोयम दर्जे का राष्ट्र बनता है।
आज के परिपेक्ष में आरक्षण के ज्वलंत मुद्दे को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय शेक्षणिक संस्थाओ में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने पर केंद्र सरकार को जमकर फटकार लगाई  है, साथ ही अल्पसंख्यक आरक्षण के खिलाफ दिए गए आन्ध्रप्रदेश हाईकोर्ट के फेसले पर भी रोक लगाने से इंकार कर दिया है। केंद्र सरकार के इस कदम से देश मे अव्यवस्थाएं ही फैलेंगी।
संविधान मे नौकरियों के आरक्षण की व्यवस्था करते वक़्त इसकी विशेष परिस्थतियो मे अधिकतम चालीस वर्ष की मियाद तय की गई थी। तब चेतावनी भी दी गई थी कि इसके बाद इसे जारी रखा गया तो यह देश मे जातीय वैमनस्य का कारण बनेगी। कोर्ट के इस फैसले से तीन सौ पच्चीस छात्रों का भविष्य अधर मे लटक गया। कोर्ट ने संविधान व कानून के हिसाब से इस आरक्षण को अनुचित बताया। क्या प्रस्तावित आरक्षण धार्मिक आधार पर है। भारतीय संविधान मे धार्मिक आधार पर आरक्षण का कोई प्रावधान भी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस सरकारी कदम का कोई संवैधानिक या विधायी आधार नहीं है। सरकार ने इस मामले मे पूरा होमवर्क नहीं किया। जिसका परिणाम सैंकड़ों छात्रों को भुगतना पड़ेगा। जिन्होंने इस साल आईआईटी, जेईई परीक्षा मे अल्पसंख्यक कोटे के आधार पर सफलता पाई।
अब लगने लगा है कि आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। आरक्षित वर्ग मे दो वर्ग बन गए और सामान्य वर्ग के लोग कुंठा के शिकार हो गए हैं। इस समय वस्तुस्थिति यह है कि आरक्षण की व्यवस्था से पिछड़े वर्गों मे एक अगड़ा वर्ग विकसित हो गया है, जो आरक्षण की सम्पूर्ण व्यवस्था को सिर्फ अपने परिजनों तक ही सीमित रखे हुए है।
एक योग्य और काबिल व्यक्ति के लिए आरक्षण, एक ऐसी फंगस बन चूका है जो उसके लिए दवा की जगह पर उलटी बीमारी को बढ़ावा दे रहा है। आज कोई छात्र अपनी काबिलियत और कड़ी मेहनत से की गई पढाई से अगर काफी अच्छे अंक हासिल कर अच्छी परसेंटेज बना भी ले तो भी शायद उसके यही अच्छे परसेंटेज एक आरक्षित छात्र के कम परसेंटेज के सामने कम ही आंके जाते हैं और इसी के कारण एक काबिल और मेहनती छात्र उचित नौकरी नहीं पा सकता और एक आरक्षित छात्र जिसके कम परसेंटेज भी उसे इस आरक्षण व्यवस्था की वजह से नौकरी दिला देते है।
दूसरी तरफ आरक्षित वर्ग का आम आदमी वैसे का वैसा ही बना हुआ है। सामान्य वर्ग भी कुंठा का शिकार हो गया। अब समय आ गया है जब आरक्षण व्यवस्था की वर्तमान परिपेक्ष्य मे नए सिरे से समीक्षा की जाये, और इसे सही राह दिखाई जाए। आज देश में चहुँऔर आरक्षण की मांग उठती हुए नजर आने लगी है, और अब तो ये मांग ऐसे-ऐसे वर्गों से भी उठने लगी है, जिन्होंने कभी इस देश पर राज किया है।
आरक्षण का ये ज्वलंत मुद्दा आखिर देश को कहां लेकर जाएगा, इसके बारे में तो मुझे काफी तलाश करने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हो सका और सिर्फ निराशा ही मेरे हाथ लगी। लेकिन, हां काफी कुछ सोच-समझने के बाद मैं तो सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगी कि अगर इस आरक्षण व्यवस्था को समाप्त ही कर दिया जाए तो कितना अच्छा होगा, जिससे जो काबिल और योग्य है, उसे अपनी मेहनत और काबिलियत कि बदौलत कोई नौकरी या फिर उसकी मेहनत के अनुसार ही कोई पद प्राप्त हो।
आपको क्या लगता है, आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य पर कितनी कारगर साबित हुई है? और क्या देश में अभी भी आरक्षण व्यवस्था कि जरुरत है या फिर इसे पूरी तरह से ख़त्म ही कर दिए जाना चाहिए?
Write below your comments-

No comments:

Post a Comment